卐 दादूराम~सत्यराम 卐
.
*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
अष्टम दिन ~
.
वां वृ. - “यदपि तपादिक साधना, दुष्कर मानी जाय ।
तदपि करूँगी सहचरी, अब तो मैं मन लाय ॥२१॥’’
.
आं वृ. - “सखि ! संसारिक भी नहीं, सुगम होत सब काम ।
किन्तु उन्हें कर सरति जन, जाते हैं दुख धाम ॥२२॥
सुख चाहैं दुखप्रद करें, कार्य यही अज्ञान ।
दुखद कार्य का तू कभी, करना नहिं सन्मान ॥२३॥’’
.
वां वृ. - “कौन सुखद अरु को दुखद, मैं जानत हूं नांहि ।
बता सखी ! उनको सदा, याद रखूँ मन मांहि ॥२४॥’’
.
आं वृ. - “पर पीड़न आदिक सभी, बुरे काम दुख देय ।
सुखप्रद पर हित आदि हैं, संत चरण नित सेय ॥२५॥
सत्संगति से होयगा, तुझको सब ही ज्ञान ।
संत संग नित किया कर, होकर के निर्मान ॥२६॥
अब मेरे अभ्यास का, समय आ गया पेख ।
जा तू करना काम अब, सदा सुखद ही देख ॥२७॥’’
.
वां वृ. - “अब तुम विन मुझको सखी ! सुहात न कछू कभी ।
मैं तज दूँगी इक दिवस, जगत के भोग सभी ॥
पर मेरा सह अनुराग, रखोगी ध्यान जभी ।
मैं भव दुख से अनयास, होउँगी मुक्त तभी ॥२८॥’’
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें