शनिवार, 28 दिसंबर 2013

= १३० =


卐 सत्यराम सा 卐
Sadguru Whispers ~ 
I don't ask from Thee, O Guru! To take away my karma. 
My prayer is for a way to make me remain unaffected by them. 
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ज्यों राखै त्यों रहेंगे, अपने बल नांही । 
सबै तुम्हारे हाथ है, भाज कत जांही ॥१६॥ 
टीका ~ हे समर्थ परमेश्‍वर ! जैसे आप हमको रखोगे, उसी प्रकार हम प्रसन्न रहेंगे सुख में या दुःख में । हमारा आपके सामने कोई बल नहीं चलता । जीवों के प्रारब्ध कर्म सब आपके हाथ में हैं, आपसे अलग हम भाग कर कहॉं जायेंगे ? हे समर्थ ! आपकी समर्थाई सर्वत्र व्यापक है ॥१६॥ 
दादू डोरी हरि के हाथ है, गल मांही मेरे । 
बाजीगर का बांदरा, भावै तहॉं फेरे ॥१७॥ 
टीका ~ हे हरि ! हमारी प्रारब्ध - कर्म रूपी डोरी आपके हाथों में है और हमारे गले में पड़ी है । जैसे बाजीगर बन्दर के गले में डोरी डालकर, जहॉं इच्छा हो, वहीं बन्दर को ले जाता है । इसी प्रकार हम तो बाजीगर के बन्दर की तरह हैं । आप प्रारब्ध कर्म डोरी को जिधर भी खींचोगे, उधर ही हम आते - जाते रहेंगे । आपकी समर्थाई सबसे ऊपर है ॥१७॥ 
कर्म डोरी गल में पड़ी, हाथ तुम्हारे मांहि । 
जगजीवन इनसे छूटि कै, भाजि कहॉं हम जांहि ॥ 
ज्यों राखै त्यों रहेंगे, मेरा क्या सारा । 
हुक्मी सेवक राम का, बन्दा बेचारा ॥१८॥ 
टीका ~ हे परमेश्‍वर ! हम तो आपकी आज्ञा में चलने वाले आपके सेवक है । जैसे आप हमारे प्रारब्ध - कर्मानुसार, हमको सुखी दुखी रखोगे, उसी प्रकार उसमें हम सुखी रहेंगे । क्योंकि इसमें मेरा क्या जोर है ? हम तो आपके हुक्म में चलने वाले आपके गरीब सेवक हैं ॥१८॥ 
साहिब राखै तो रहे, काया मांही जीव । 
हुक्मी बन्दा उठ चले, जब ही बुलावे पीव ॥१९॥ 
टीका ~ हे साहिब ! हे परमेश्‍वर ! आप इस स्थूल शरीर में जीव को जब तक रखोगे, तब तक रहेगा । और जब आपका हुक्म होगा कि ‘‘आ जाओ’’ उसी समय बन्दे की तरह हम चले आयेंगे । जैसे सेवक को स्वामी जब बुलाता है, तभी उठकर चल देता है, वैसे ही हम तो आपकी समर्थाई रूप हुक्म में हैं ॥१९॥ 
बाजींदा पूत पठाण का, किस सौं करै सनेह । 
राति बसै दिन उठि चलै, आंधी गिणै न मेह ॥ 
(श्री दादू वाणी ~ समर्थता का अंग)

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