गुरुवार, 9 जनवरी 2014

श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता(न.दि.- २४/५)

卐 दादूराम~सत्यराम 卐
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*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
नवम दिन ~
छत्र छाय हो जिस पर जाकी, 
आज्ञा चले सभी पर बाकी ।
छाय हमा से भूपति होवे, 
नहिं, गुरु कृपा अविद्या खोवे ॥२४॥
आ. वृ. - “हुमा जिस पर भी छाया कर देता है, उसकी आज्ञा सब पर चलने लगती है । बता वह कौन है ?’’ 
वा. वृ. - “वह तो हुमा पक्षी है । वह जिस किसी मनुष्य पर भी अपने पंखों की छत्र के समान छाया कर देता है, तब वह मनुष्य राजा बन जाता है । फिर उसकी आज्ञा सब पर चल पड़ती है ।’’ 
आ. वृ. - “नहिं, सखि ! यह तो सद्गुरु कृपा है । सद्गुरु जिस पर कृपा कर देते हैं, उसकी अविद्या नष्ट हो जाती है । अविद्या हीन होने पर ब्रह्म स्वरूप की प्राप्ति हो जाती है; फिर ब्रह्म स्वरूप होने से सभी विश्‍व पर उसकी आज्ञा चलने लगती है । तू भी सद्गुरु कृपा प्राप्त करने की चेष्टा करना । सद्गुरु कृपा प्राप्त होते ही परमानन्द प्राप्त हो जायगा ।’’
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सखी ! एक हत द्वितीय मारा, 
तृतीय संग हर्ष विस्तारा ।
तृतीय मित्र दोउ रिपु तेरे, 
तम रज सत्व सखी ! मैं टेरे ॥२५॥
आ. वृ. - “एक को नष्ट करके दूसरे को भी नष्ट किया, फिर तृतीय के साथ आनन्द प्राप्त हुआ । बता वे कौन हैं ?’’ 
वा. वृ. - “दो तो तुम्हारे शत्रु होंगे और एक मित्र ।’’ 
आ. वृ. - “नहिं, सखि ! ये तो तमोगुण, रजोगुण, सतोगुण हैं । तमोगुण से अज्ञान आलसादि रहने से दु:ख ही रहता था । रजोगुण से विशेष लोभ आशा आदि होने से सदा विक्षेप ही रहता था । मैंने रजोगुण बढ़ाकर तमोगुण को नष्ट किया फिर, सतोगुण बढ़ाकर, रजोगुण को भी नष्ट कर डाला । अब केवल सतोगुण ही मेरे स्रदय में बढ़ा हुआ रहता है । जब से सतोगुण बढ़ा है तब से ही मुझे आनन्द मिल रहा है । सखि ! तू भी अपने स्रदय के तमोगुण, रजोगुण को नष्ट करके सतोगुण बढ़ाने का साधन कर, जिससे तुझे भी आगे नाना दु:ख न उठाने पड़े । सतोगुण बढ़ाने की युक्ति तुझे संत जन बतावेंगे । उनके पास जाकर नम्र भाव से पूछा कर, यदि ऐसा करेगी तो सुखी हो जायगी ।’’
(क्रमशः)

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