मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

१. गुरुदेव को अंग ~ १५

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*गुरु बिन ज्ञांन नांहि गुरु बिन ध्यान नांहि,*
*गुरु बिन आतम - बिचार न लहतु है ।*
*गुरु बिन प्रेम नांहि गुरु बिन प्रीति नांहि,*
*गुरु बिन शील हू सन्तोष न गहतु है ॥*
*गुरु बिन प्यास नांहि बुधि कौ प्रकाश नांहि,*
*भ्रम हू कौ नाश नांहि संशय रहतु है ।*
*गुरु बिन बाट नांहि कौड़ी बिन हाट नांहि,*
*सुन्दर प्रकट लोक वेद यौं कहतु है ॥१५॥*
किसी भी साधक को गुरु के बिना ज्ञान एवं ध्यान का मार्ग नहीं मिल पाता, न वह गुरु के बिना आत्मविचार में ही प्रवृत्त हो सकता है । 
गुरु के बिना साधक का प्रभु में न प्रेम हो सकता है, न प्रीति; तथा न वह उसके बिना सदाचार एवं सन्तोष आदि सद्गुण ही प्राप्त कर सकता है ।
गुरु के बिना साधक को न आत्मज्ञान - पिपासा हो सकती है और न उस के हृदय में ज्ञान का प्रकाश ही हो सकता है; न उसके जगद्विषयक भ्रम एवं सन्देह ही दूर हो सकते हैं । 
जैसे किसी सच्चे पथप्रदर्शक के बिना मार्गज्ञान नहीं हो पाता; या जैसे पैसे(कौड़ी) के बिना बाजार से कोई वस्तु नहीं खरीदी जा सकती; श्री सुन्दरदास जी कहते हैं - वैसे ही 'गुरु के बिना किसी भी साधक को सन्मार्ग में प्रवृत्ति नहीं हो सकती' - यह बात समस्त संसार और शास्त्रों द्वारा स्पष्टत: कही गयी है ॥१५॥
(क्रमशः)

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