मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

= त्र. त./३१-३२ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“त्रयोदश - तरंग” ३१-३२)* 
*तेज का कमलासन तखत* 
एकहिं एक भिड़े सब बैठत, 
ठौर नहीं कछु भी तिल जाये । 
आवत सोहि फकीर कहाँ इत, 
बैठन की निज ठौर बनाये ॥ 
तेज स्वरूप रच्यो कमलासन, 
अद्भुत देख अचम्भ भराये । 
व्योम दिपै अधरा गुरु आसन, 
तेजहिं पुंज प्रकाश रहाये ॥३१॥ 
फिर एक से एक सटकर इस तरह बैठ गये कि - पूरे दरबार भवन में तिल रखने की जगह भी नहीं छोड़ी । वे मूढ़ परस्पर बातें करने लगे कि - देखें, अब वह फकीर आकर कहाँ बैठता है ? सिद्ध संत श्री दादूजी ने दरबार की स्थिति को देखा और तत्काल तेजोमय कमलासन की रचना की । सभी दरबारी यह देखकर अचम्भित रह गये कि - अधर आकाश में गुरुदेव का कमलरूप सिंहासन सुशोभित हो रहा है, उसका दिव्य तेजपुंज सर्वत्र प्रकाश फैला रहा है ॥३१॥ 
छाय रहि छवि तेज सिंहासन, 
कोटिक भानु उजास भये है । 
वर्ण सकै जन कौन महामति, 
शारद शेष न पार लह्ये है । 
जय जय शब्द भये नभ तै जब, 
दिव्यहिं पुष्प झराय रह्ये है । 
और सबै शिष स्तुति गावत, 
चामर टील झुलाय थह्ये है ॥३२॥ 
उस तेजोमय सिंहासन की छवि कोटि सूर्यों के समान उजागर होने लगी । उसकी महिमा कौन महामति वर्णन कर सकता है, जिसका पार शारदा और शेषनाग भी नहीं पा सकते । आकाश में जय - जय शब्द होने लगे, दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी । सभी शिष्य संत स्तुति करने लगे, टीलाजी चामर ढुलाने लगे ॥३२॥ 
(क्रमशः)

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