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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“त्रयोदश - तरंग” ३१-३२)*
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*तेज का कमलासन तखत*
एकहिं एक भिड़े सब बैठत,
ठौर नहीं कछु भी तिल जाये ।
आवत सोहि फकीर कहाँ इत,
बैठन की निज ठौर बनाये ॥
तेज स्वरूप रच्यो कमलासन,
अद्भुत देख अचम्भ भराये ।
व्योम दिपै अधरा गुरु आसन,
तेजहिं पुंज प्रकाश रहाये ॥३१॥
फिर एक से एक सटकर इस तरह बैठ गये कि - पूरे दरबार भवन में तिल रखने की जगह भी नहीं छोड़ी । वे मूढ़ परस्पर बातें करने लगे कि - देखें, अब वह फकीर आकर कहाँ बैठता है ? सिद्ध संत श्री दादूजी ने दरबार की स्थिति को देखा और तत्काल तेजोमय कमलासन की रचना की । सभी दरबारी यह देखकर अचम्भित रह गये कि - अधर आकाश में गुरुदेव का कमलरूप सिंहासन सुशोभित हो रहा है, उसका दिव्य तेजपुंज सर्वत्र प्रकाश फैला रहा है ॥३१॥
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छाय रहि छवि तेज सिंहासन,
कोटिक भानु उजास भये है ।
वर्ण सकै जन कौन महामति,
शारद शेष न पार लह्ये है ।
जय जय शब्द भये नभ तै जब,
दिव्यहिं पुष्प झराय रह्ये है ।
और सबै शिष स्तुति गावत,
चामर टील झुलाय थह्ये है ॥३२॥
उस तेजोमय सिंहासन की छवि कोटि सूर्यों के समान उजागर होने लगी । उसकी महिमा कौन महामति वर्णन कर सकता है, जिसका पार शारदा और शेषनाग भी नहीं पा सकते । आकाश में जय - जय शब्द होने लगे, दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी । सभी शिष्य संत स्तुति करने लगे, टीलाजी चामर ढुलाने लगे ॥३२॥
(क्रमशः)

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