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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“त्रयोदश - तरंग” ३३-३४)*
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*बादशाह ने अपना सिंहासन छोड़ा*
भूमि अकाश बिचे दिव्य असन,
देखि रहे दरबारि खरे हैं ।
स्तम्भित होवहिं शाह अकैंबर,
आसन तेजहिं देखि हुरे हैं ।
आपनु आसन छाँड़ि अकैंबर,
जोरहिं हाथ रु भूमि परे हैं ।
दादू दयालु हिं मैं न लखी गति,
साहिब की गति आप धरे हैं ॥३३॥
भूमि और आकाश के बीच दिव्य आसन को देखकर सभी दरबारी खड़े हो गये । बादशाह अकबर इस अद्भुत लीला को देखकर स्तम्भित हो गया और दिव्यासन के तेज से डरने लगा । वह अपना सिंहासन छोड़कर, हाथ जोड़े हुये भूमि पर गिर पड़ा, तथा प्रार्थना करने लगा - हे दादू दयालु । मैं आपकी गति नहीं पहिचान सकता, आप तो साहिब जैसी समर्थाई धारण करने वाले हैं ।
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तज्यो सिंहासन, करी सलाम,
तुम मुरसीद, मैं गरीब गुलाम ।
जो दादू का बुरा विचारे,
ताकूं गज व गैब का मारे ॥३३॥
*अकबर का माफी मांगना*
संत दया करि मोहि उबारहु,
शान्त करो अब आपनु कोपा ।
काजि मुल्ला खल की करतूत जु,
वे कुटिलाय जु आसन लोपा ।
साधुन की समता सुखदायक,
वेद कुरान लखे नहिं ओपा ।
ये जग जीव कहाँ लगि जानत,
मूढ वृथा करि वाद हिं रोपा ॥३४॥
हे संत ! दया करके मुझे उबारो, अब अपना कोप शान्त करो । यह सारी करतूत इन दुष्ट काजी मुल्लाओं की है, जिन्होंने आपका आसन छिपाया । ये कुटिलमति आप जैसे सिद्ध - संतों की सुखदायक क्षमता भला कैसे जान सकते हैं ? आपकी उपमा - महिमा तो वेद कुरान द्वारा भी अगम अलक्ष्य है । ये जगत् के साधारण जीव मूढ हैं, जो वृथा ही विवाद कर बैठे हैं ॥३४॥
(क्रमशः)

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