बुधवार, 30 अप्रैल 2014

= सुन्दरी का अंग ३० =(२३/२४)

#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*सुन्दरी का अंग ३०*
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*सुन्दरी सुहाग ~*
*प्रेम लहर गह ले गई, अपने प्रीतम पास ।* 
*आत्म सुन्दरी पीव को, विलसै दादू दास ॥२३॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासु ! परमेश्वर में अनन्य प्रेम की अवस्था ही, वृत्ति रूप सुन्दरी को पकड़कर आत्मा के स्वरूप में स्थिर करती है । तब शुद्ध बुद्धि रूप सुन्दरी अपने अधिष्ठान स्वरूप चैतन्य आत्मा का भजन करती है ॥२३॥ 
*सुन्दरी को साँई मिल्या, पाया सेज सुहाग ।* 
*पीव सौं खेलै प्रेम रस, दादू मोटे भाग ॥२४॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासु ! अति उत्तम वृत्ति पुरुष सुन्दरी को अधिष्ठान चैतन्य रूप परमेश्वर का साक्षात्कार सुहाग प्राप्त होता है । वही मुख प्रीति का विषय परमेश्वर से एकत्व रूपी प्रेम - रस पीकर कृत - कृत्य होती है ॥२४॥
(क्रमशः)

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