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॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*सुन्दरी का अंग ३०*
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*दादू सुन्दरी देह में, साँई को सेवै ।*
*राती अपने पीव सौं, प्रेम रस लेवै ॥२५॥*
टीका ~ हे जिज्ञासु ! इस शरीर में ही वृत्ति रूप सुन्दरी अन्तःकरण प्रदेश में अधिष्ठान चैतन्य परमेश्वर की स्मरण रूप सेवा करती है और उसी में राती = रत्त और माती = मत्त वाली बनी रहती है ॥२५॥
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*दादू निर्मल सुन्दरी, निर्मल मेरा नाह ।*
*दोन्यों निर्मल मिल रहे, निर्मल प्रेम प्रवाह ॥२६॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! निर्वासनिक विरहीजनों की वृत्ति रूप सुन्दरी, विषय - वासना और अहंकार से शून्य, ‘नाह’ कहिये पति व माया अविद्या अंश से रहित परमेश्वर का निष्काम स्नेह नाम प्रीति, प्रवाह कहिए अखंड धारा रूप प्रेम पीकर गलतान रहती है ॥२६॥
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*साँई सुन्दरी सेज पर, सदा एक रस होइ ।*
*दादू खेलै पीव सौं, ता सम और न कोइ ॥२७॥*
इति सुन्दरी का अंग सम्पूर्णः ३०॥साखी २७॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि दादूदयाल महाराज कहते हैं कि हे जिज्ञासुओं ! अद्वैत सत्संग में अथवा हृदय - प्रदेश में संत - वृत्ति और अधिष्ठान चैतन्य दोनों की ही अभेद स्थिति होती है । वही पीव से ब्रह्म - चिन्तन रूपी खेल खेलते हैं । उनके समान बहिरंग सकामी देवी - देवताओं के उपासक नहीं होते हैं ॥२७॥
इति सुन्दरी का अंग टीका सहित सम्पूर्णः ३० ॥साखी २७॥
(क्रमशः)

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