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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*काल का अंग २५/३६*
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*सूता काल जगाय कर, सब पैसैं मुख मांहि ।*
*दादू अचरज देखिया, कोई चेते नांहि ॥३६॥*
दृष्टांत -
दोय पुरुष मग जाते थे, देखा सोबत नाग ।
एक बरज तैं लात दी, खाय मरा उहि जाग ॥६॥
दो पुरुष मार्ग से जा रहे थे । आगे मार्ग में एक विशाल काला सर्प सोया पड़ा था । उसे देखकर एक ने कहा - यह मार्ग में पड़ा है, मैं इसे मार्ग से दूर करता हूँ । दूसरे ने कहा - पड़ा रहने दो, तुम्हारा क्या लेता है ? क्यो छेड़ते हो ? किन्तु उसने नहीं माना और सर्प के लात मारी तब सर्प ने कुपित होकर उसे काट लिया । फिर वह वहीं मर गया । सोई उक्त ३६ की साखी में कहा है कि - प्राणी सोते हुये काल को जगाकर उक्त व्यक्ति के समान काल के मुख में जाते हैं ।

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