रविवार, 28 सितंबर 2014

= ११९ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
बासण विषय विकार के, तिनको आदर मान ।
संगी सिरजनहार के, तिन सौं गर्व गुमान ॥
अंधे को दीपक दिया, तो भी तिमिर न जाय ।
सोधी नहीं शरीर की, तासन का समझाइ ॥
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साभार : बिष्णु देव चंद्रवंशी ~ 
-●●●●|||| सत्य और मिथ्या ||||●●●●- 

झूठे आदमी को कभी शान्ति नहीं मिल सकती चाहे वह कुवेर के समान धनवान क्यों न हो | धर्महीन शिक्षा होने के कारण लोगों को कर्त्तव्याकर्त्तव्य का विवेक कम हो गया है। जैसा करने लगते हैं उसी को ठीक समझते हैं। 'पाप करैगें तो नरक की यातनाएं भोगनी पड़ेंगी' - यह भावना प्रायः लोप सी हो गई है। यही कारण है कि आजकल समाज में असत्य का व्यवहार बढ़ गया है। प्रत्यक्ष में इन्द्रिय भोग - सामग्री का साधन अर्थं को ही लोग सब कुछ समझने लगे हैं। यही कारण है कि अर्थं संग्रह में विहताविहित का ध्यान नहीं रखते। किन्तु यह निश्चित है कि असत् व्यवहार से कभी भी शान्ति का अनुभव नहीं हो सकता।सत्संग की कमी के कारण चरित्र - हीनता फैली है। 
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आजकल लोग यह विश्वास नहीं करते कि बिना बेइमानी किए उनका काम चल सकता है, न भाग्य पर भरोसा है और न विश्वम्भर पर ही विश्वास है। परमात्मा पर विश्वास रखो और कुछ समय सत्यता का व्यवहार करके देखो। इससे जीवन में सन्तोष का अनुभव होगा और संतोष ही सुख का स्वरूप माना गया है। यथा - 'सन्तोष परमं सुखम्'। झूठे आदमी को कभी भी शांति नहीं मिल सकती, चाहे वह कुबेर के समान धनवान क्यों न हो जाय। यह सदैव शंकित रहता है और उसका हृदय जलता रहता है। 
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इस प्रकार वह इस लोक में भी सुखी नहीं रह पाता और परलोक तो उसका बिगड़ता ही है।दूसरे में नहीं -अपने में दोष देखो*चरित्रवान मनुष्य की लोक - परलोक दोनों में शान्ति का अनुभव कर सकता है। जो चरित्र भ्रष्ट है उसे न इस लोक में शान्ति रहती है, और परलोक में उसके लिए शांति की बात ही क्या! दूसरों की बुराइयाँ मत देखो, अपने में ढुढ़ो कि कौन सी बुराई अभी तक है, उसे हटाने का प्रयत्न करो। 
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अपने में दोष खोज - खोज कर निकाला तो कल्याण होगा। कभी भी किसी के दोषों का चिन्तन मत करो। दूसरों में दोष ढूंढ़ने से अपना भी अन्तःकरण मलिन होता है। पाप कोई करे और उसका चिन्तन हम करें - यह तो कोई हमारे लाभ की बात नहीं। जब हम स्वयं पाप करने से डरते हैं तो दूसरे के पापों का चिन्तन करके अपने मन को पापी क्यों बनायें? दूसरे के दोषों का चिन्तन करोगे तो उसको तो कोई लाभ होगा नहीं, उल्टे दूसरे के दोष तुम्हारे मन में घुसेंगे। इसलिये ऐसा काम करो कि कम से कम अपनी रक्षा तो रहे। अपनी रक्षा का ध्यान न किया तो जैसे आंधी आयेगी उसी में उड़ जाओगे।
अपने को ही देखने का अभ्यास करो। नित्य सायंकाल विचार करो कि आज हममें कितने गुण - दोष आये और कितने छूटे। अपने दोषों को देखने लगोगे तो फिर धीरे - धीरे दोष अपने आप छूटने लगेंगे। दोषों के सम्बन्ध में पहले अपनी चिन्ता रखो; दूसरे की बात सोचना अपने लिये घातक है। पहले अपनी रक्षा करो, बाद में दूसरे की चिन्ता।

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