#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
एक कहूँ तो दोइ हैं, दोइ कहूँ तो एक ।
यों दादू हैरान है, ज्यों है त्यों ही देख ॥
दादू केते कह गये, अंत न आवै ओर ।
हमहूँ कहते जात हैं, केते कहसी होर ॥
दादू मैं क्या जानूँ क्या कहूँ, उस बलिये की बात ।
क्या जानूँ क्यों ही रहै, मो पै लख्या न जात ॥
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परमात्मा सगुण हैं या निर्गुण ?
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साधक को अपने मत, सम्प्रदाय आदि का आग्रह नहीं रखना चाहिये, प्रत्युत उसका अनुसरण करना चाहिये ।अपने मत का आग्रह रखने से उसका दूसरे मत से द्वेष हो जायगा, जिससे वह दूसरे मत की बातों को निष्पक्ष होकर नहीं सुन सकेगा । सभी मत, सम्प्रदाय आदि में अच्छे-अच्छे सन्त-महापुरुष हुए हैं । अपने मत का आग्रह रहने से साधक उन सन्त-महापुरुषों की अच्छी-अच्छी बातों से वंचित रह जायगा ।
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अत: साधक को चाहिये कि वह प्रत्येक मत, सम्प्रदाय आदि की बातों को निष्पक्ष होकर सुने, उनपर गहराई से विचार करे और जो बातें उपयोगी लगें, उनको ग्रहण करे । साधक को सारग्राही बनना चाहिये । अगर उसको अपने या दूसरे के मत में कोई शंका पैदा हो जाय तो जिन पर उसकी श्रद्धा हो, उनसे पूछकर समाधान कर लेना चाहिये । न समझने के कारण अपने मत में कोई कमी या बाधा दीखे तो उसका त्याग कर देना चाहिये । उपनिषद् में आचार्य अपने शिष्यों को उपदेश देते हैं‒
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‘यान्यनवद्यानि कर्माणि । तानि सेवितव्यानि ।
नो इतराणि । यान्यस्माकं सुचरितानि ।
तानि त्वयोपास्यानि । नो इतराणि ।’
(तैत्तिरीय॰ १ । ११)
‘जो-जो निर्दोष कर्म हैं, उनका ही तुम्हें सेवन करना चाहिये, दूसरे (दोषयुक्त) कर्मोंका कभी आचरण नहीं करना चाहिये । हमारे आचरणोमेसे भी जो-जो अच्छे आचरण दीखें, उनका ही तुम्हें सेवन करना चाहिये, दूसरोंका कभी नहीं ।’
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इसका अर्थ यह नहीं है कि उन आचार्यों में कोई कमी या दोष है । कमी हमारी समझ में है उनमें नहीं । अत: उनकी कोई क्रिया हमारी समझ में न आये, उसमें हमारी दोषदृष्टि हो जाय तो उसका अनुसरण नहीं करना चाहिये । साधक का वास्तविक गुरु उसका ‘विवेक’ ही है । अत: अपने विवेक का आदर करने की बड़ी भारी आवश्यकता है । जितना जानते हैं, उसको मान लें‒यह विवेक का आदर है ।
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यह नाशवान् है‒ऐसा जानते हुए भी उसमें प्रियता करना अपने विवेक का अनादर है । जिसकी नाशवान् में प्रियता है, वह अविनाशी तत्त्व को कैसे समझेगा ? अगर वह असत् में ही उलझा रहेगा तो सत्-तत्त्व की प्राप्ति कैसे होगी ? जिसकी भोग और संग्रह में प्रियता है, वह परमात्मतत्व की प्राप्ति तो दूर रही, उसकी प्राप्ति का निश्चय भी नहीं कर सकता‒
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भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धि: समाधौ न विधीयते ॥
(गीता २ । ४४)
‘उस पुष्पित(भोगों का वर्णन करने वाली) वाणी से जिनका अन्तःकरण हर लिया गया है अर्थात् भोगों की तरफ खिंच गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, उन मनुष्यों की परमात्मा में निश्चयात्मि का बुद्धि नहीं होती ।’
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साधक के लिये केवल इतना ही मान लेना आवश्यक है कि ‘परमात्मतत्त्व है’ अथवा ‘संसार नहीं है’ । परमात्मतत्त्व कैसा है‒यह जानने की जरूरत नहीं है । कारण कि परमात्मतत्त्व विचार का विषय नहीं है, प्रत्युत श्रद्धा-विश्वास का, मान्यता का विषय है* परन्तु ‘परमात्मा है’‒इसकी दृढ़ता के लिये ‘संसार नहीं है’‒यह विचार करने की आवश्यकता है ।
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जैसे, शरीर प्रतिक्षण बदल रहा है, अभाव में जा रहा है‒यह प्रत्यक्ष अनुभव की बात है । बचपन में जैसा शरीर था, वैसा अब नहीं रहा, सर्वथा बदल गया, पर मैं(स्वयं) वही हूँ‒इस प्रकार शरीर के बदलने का ज्ञान सबको है, पर अपने बदलने का ज्ञान किसी को भी नहीं है; क्योंकि अपना स्वरूप कभी बदलता ही नहीं । ऐसा विचार करके साधक बदलनेवाले(संसार) से विमुख हो जाय तो उसको न बदलनेवाले (परमात्मतत्त्व) का अनुभव हो जायगा ।
नारायण ! नारायण !! नारायण !!!
‒‘जिन खोजा तिन पाइया’ पुस्तक से

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