बुधवार, 10 सितंबर 2014

= विं. त. २८/२९ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“विंशति तरंग” २८/२९)*
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*सांभर में २० दिन विराजे करडाला पधारे ~*
बासर बीस रहे जन साँभर, पूजत ताहिं सबै नर नारी ।
आप कल्याणपुरी पग धारत, दीन दयाल सबै सुखकारी ॥ 
संत सुदर्शन पाय सभीजन, मौज भई मन मोद अपारी ।
ज्यों बरषा बरसै बिच आश्‍विन सूखत नाहिं रहे हरि सारी ॥२८॥ 
श्री दादूजी साँभर नगर में बीस दिन बिराजे । पश्‍चात् कल्याणपुरी की तरफ प्रस्थान कर गये । मार्ग के भक्त सेवकों को दर्शन से सुखी करते हुये श्री दादूजी की पदयात्रा ऐसी थी, जैसे आश्‍विन मास के बीच - बीच में वर्षा बरसती है, जिससे खेतों की फसलें सूखती नहीं, अपितु हरी भरी रहती है । इस प्रकार संत भी बार - बार सेवक भक्तों को संभालते रहते हैं, जिससे उनकी भक्ति की फसल सूखती नहीं ॥२८॥ 
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*चतुर्भुज मिलने आये दर्शनार्थी ~*
पूर्व चतुर्भुज है जन सेवक, शिष्य सुनी गुरु हैं मधि देशा ।
लालहिं कोसुत, भाव भयो उर, दर्श करूं कब जाय कलेशा ॥ 
छोड़ि चले परिवार सुबान्धव, होत विदा मन प्रीति विशेषा ।
साँभर आय नहीं गुरु पावत, फेर कल्याणपुरी गमनेशा ॥२९॥ 
पूर्व देश के निवासी चतुर्भुज बनजारे ने गुरुदेव का नाम सुना । उनके हृदय में गुरुदर्शन की लालसा तीव्र हो उठी । लालाराम बनजारा का पुत्र वह चतुर्भुज अपने घर कुटुम्ब को छोड़कर गुरुदर्शन को चल दिया । मन में श्रद्धाभक्ति हिलोरें ले रही थी । साँभर आने पर गुरुदेव नहीं मिले तो कल्याणपुरी की तरफ चल पड़ा ॥२९॥ 
(क्रमशः) 

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