बुधवार, 10 सितंबर 2014

७. विश्वास का अंग ~ १३

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*७. विश्वास का अंग* 
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*तूं तौ भयौ बावरौ उतावरौ फिरत अति,*
*प्रभु कौ बेसास गहि काहै न रहतु है ।* 
*तेरौ तौ रिजक है सु आइ है सहज मांहि,* 
*यौं हि चिंता करि करि देह कौं दहतु है ॥* 
*जिनि यह नख सिख साजि कैं संवार्यो तोहि,* 
*अपने किये की वह लाज कौं बहतु है ।* 
*काहै कौं अज्ञानी कछु सोच मन मांहि करै,* 
*भूखौ तूं कदे न रहै सुन्दर कहतु है ॥१३॥* 
महात्मा *श्री सुन्दरदासजी* उपदेश कर रहे हैं – तूँ तो पागल हो गया है, तेरी बुद्धि भ्रान्त हो गयी । तूँ प्रभु पर विश्वास क्यों नहीं करता । 
तूँ तो प्रारब्ध लिखा कर लाया है, वह तुझे अवश्य मिलेगा ! अतः तू व्यर्थ चिन्ताएँ कर अपनी देह को जला रहा है । 
तुझ को बनाने वाले जिस भगवान् ने तेरे शरीर में ये सुन्दर आँख, कान, नाक, मुख बनाये हैं वह अपने किये की लज्जा रखने में स्वयं तत्पर रहता है । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं – अतः रे अज्ञानी ! तूँ अपने मन में किस बात की चिन्ता कर रहा है ! तूँ उस पर विश्वास कर । वह तुझे भूखा नहीं रहने देगा ।(यह मैं तुझे अपने अनुभव से समझा रहा हूँ) ॥१३॥
(क्रमशः)

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