मंगलवार, 16 सितंबर 2014

#daduji

||दादूराम सत्यराम||
दादू सूखा रूंखड़ा, काहे न हरिया होइ ।
आपै सींचै अमीरस, सुफल फलिया सोइ ॥ ७ ॥
टीका ~ हे जिज्ञासु ! यह स्थूल शरीर रूपी वृक्ष, ज्ञान - भक्ति रूप जल प्राप्त किये बिना सूख रहे हैं । अब किस प्रकार हरे होवें ? यदि उत्तम भाग्य से सच्चे ब्रह्मनिष्ठ सतगुरु मिलें और वे अपने सत्य उपदेश अमृत रूप जल से सींचें, तो फिर उन शरीर रूपी वृक्षों के ज्ञान अमृत रूप फल लगें ॥ ७ ॥

कदे न सूखै रूंखड़ा, जे अमृत सींच्या आप ।
दादू हरिया सो फलै, कछू न व्यापै ताप ॥ ८ ॥
टीका ~ हे जिज्ञासु ! जो चतुर साधक, इस काया रूप वृक्ष को अर्थात् अन्तःकरण में, निष्काम नाम - चिन्तन रूप जल से सींचे, तो भाव - भक्ति रूप हरियाली वाला बना रहे और आत्म - परिचय रूपी ज्ञान - फल से फले । फिर उस फल को उत्तम साधक खाकर जन्म - मरण रूप संताप से मुक्त होवे ॥ ८ ॥

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