मंगलवार, 16 सितंबर 2014

= एक विं. त. ३/४ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“एकविंशति तरंग” /४)*
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*श्री करडाला जी विराजे -*
संत रमे गुरु आयसु पावत, 
ज्ञान रू भक्ति बधावत देशा ।
दादु गुरु करडाल विराजत, 
ध्यान धरें नित बह्म तपेशा ॥ 
ताहिं समै इक भूप नरायण, 
दुर्जन शाल जु वीर नरेशा ।
शाह अकैंबर सैन्यपती यह, 
काज सँवारत दक्षिण देशा ॥३॥ 
गुरु - आज्ञा पाकर संत विभिन्न दिशाओं में प्रस्थान कर गये । रुचि अनुसार ग्रामों में आश्रम बनाकर भक्तिज्ञान का उपदेश देने लगे । उसी समय नारायणपुरी के राजा नारायणसिंह को स्वप्न में श्रीहरि ने आदेश दिया कि - ‘‘संत श्री दादूजी को अपने नगर में लाकर विराजमान करो ।’’ यह नारायणसिंह अपने भाई दुर्जनशाल के साथ दक्षिण दिशा में बादशाह अकबर की ओर से सेनापति बनकर युद्ध के लिये गया हुआ था ॥३॥ 
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*राजा नारायणसिंह को स्वप्न और युद्ध में विजय -*
अर्धनिशा मधि स्वप्न दियो हरि, 
तूं अपने पुर जाउ नरेशा ।
दादु दयालु सुसंत तपे तहँ, 
शैल कल्याणपुरी तब देशा ॥ 
सादर ताहिं थपो अपने पुर, 
होत कल्याण धरो उपदेशा ।
भूप नरायण दुर्जनशाल जु, 
भाइ उभै तब आये स्वदेशा ॥४॥ 
अर्द्धरात्रि के समय राजा नारायणसिंह को स्वप्न में दर्शन देकर श्रीहरि ने आदेश दिया कि - हे नरेश ! तुम अब अपने पुर जाओ । तुम्हारी राज्य सीमा में कल्याणपुरी के पर्वत पर तपस्या कर रहे संत दादूजी को आदर सहित अपने नगर में ले आओ, और धाम बनाकर उन्हें विराजमान करो । इससे तुम्हारा कल्याण हो जायेगा । स्वप्न के बाद राजा प्रात: तक जागता रहा । प्रात: अपने भाई दुर्जनशाल से परामर्श किया, और ईश्‍वर आज्ञानुसार संत - सेवा का संकल्प लेकर युद्ध भूमि में गया । श्री हरि की कृपा से युद्ध में विजय हो गई । विजय - अभियान सम्पूर्ण हो जाने पर दोनों भाई अपने देश के लिये चल पड़े ॥४॥ 
(क्रमशः)

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