गुरुवार, 4 सितंबर 2014

= विं. त. १५/१६ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“विंशति तरंग” १५/१६)*
*टहलड़ी ग्राम में पधारे*
बाइ मरूगन श्याम गुपाल जु, 
झालण स्वामिजु भक्ति करी है ।
टहटड़ि नागरदास निजाम जु, 
ल्याय गुरु पद पट्ट परी है ॥ 
सेवक को सुख देन पधारत, 
दास दयाल विराग खरी है ।
दास जु पाणि गही पद पंकज, 
सेव करी अतिभाव भरी है ॥१५॥ 
मरूगन बाई, श्यामदास और गोपालदास झालाणा ग्राम में हरिभक्ति में संलग्न थे, उन्होंने गुरुदेव का आगमन समीप जानकर श्रद्धा से सेवा की । पश्‍चात् श्री दादूजी टहलड़ी - ग्राम में पधारे । वहाँ नागरदास और निजाम ने गुरुचरणों की वन्दना की, और कहा - हे गुरुदेव ! आप बहुत कृपालु हैं, जो सेवकों को सुख देने यहाँ पधारे है । दयालदास के मन में उस समय अतीव वैराग्य भाव उदय हुआ । उसने गुरुदेव के चरण पकड़ लिये, और गद्गद भाव से विह्वल हो गया ॥१५॥ 
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*दौसा नगर में पधारे*
टहलडि गंग रहे भगवान जु, 
माधव खेम मनोहर केशो ।
दौसहिं खेम नरायण माधव, 
बोहित दास लिये उपदेशो ॥ 
माधव पंडित है भगवान जु, 
दर्शन पावत जाय अँदेशो ।
आज भये धनि भाग हमार हिं, 
संत पधारत तीरथ देशो ॥१६॥ 
टहलड़ी ग्राम में गंगाराम, भगवाना, माधव, खेमाराम, मनोहर, केशव ने अतीव श्रद्धा से गुरुदेव की, सेवा कर अपना जीवन सफल बनाया । पश्‍चात् श्री दादूजी दौसा ग्राम में पधारे । वहाँ खेमाराम, नारायण, माधव, और बोहितदास ने गुरुदेव से उपदेश लिया । माधव पंडित और भगवाना के मन की सभी शंकायें मिट गई । वे बोले - आज हमारे धन्य भाग्य हैं, जो गुरुदेव का उपदेश मिला । यह देश संतों के पधारने से तीर्थरूप हो गया ॥१६॥ 
(क्रमशः) 

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