रविवार, 21 सितंबर 2014

#daduji

||दादूराम सत्यराम||
अथ अबिहड़ का अंग ३७ -

“दादू अमर फल खाइ” - इस सूत्र के व्याख्यान स्वरूप बेली के अंग के तदनन्तर, अब अबिहड़ का अंग निरूपण करते हैं ।

मंगलाचरण -
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥ १ ॥
टीका ~ अब हरि, गुरु, संतों को नमो, नमस्कार, वन्दना प्रणाम आदि करके ‘अबिहड़’ कहिये, न बदलने वाले स्वरूप निरंजनदेव, अर्थात् उस एक अद्वैत अविनाशी ब्रह्मतत्व का विचार करने के लिए अज्ञान से पार होकर, नित्य संयोग को समझ कर, ब्रह्म में अभेद होते हैं ॥ १ ॥

दादू संगी सोई कीजिये, जे कलि अजरावर होइ ।
ना वह मरै, न बीछूटै, ना दुख व्यापै कोइ ॥ २ ॥
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! उसी को अब साथी बनाइये, जो इस कलि संसार में, अजर अमर स्वरूप है, वह न तो मरता है और न बिछुड़ता है । न उसको किसी प्रकार का दुख व्याप्त होता है ॥ २ ॥
आदि मध्य अरु अंत लौं, हरि है सदा अभंग ।
कबीर उस कर्तार का, सेवक तजै न संग ॥



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