रविवार, 21 सितंबर 2014

= एक विं. त. १३/१४ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“एकविंशति तरंग” १३/१४)*
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*आकाशवाणी के अनुसार श्री दादूजी हाथी पर विराजे -* 
वाजि तुरंग मतंग रहे रथ, 
भाव धरो गुरु जो मन भाये । 
पैदल नाहिं चलो गुरुजी अब, 
सेवक भाव रखो हरषाये ॥ 
होत गिरा नभ संत चुने सब, 
आप चढे गज सेवक लाये ।
संग चले रथ बैठत साधु जु, 
भक्त नरायण प्रेम बधाये ॥१३॥ 
राजा के विनम्र आग्रह पर संत प्रस्थान करने लगे, तब राजा बोला - हाथी, घोड़े और रथ आपकी सेवा में हाजिर है, अपनी रूचि अनुसार वाहन पर विराजिये । हे गुरुदेव ! अब पैदल मत चलिये, मुझ सेवक का भाव भी रखिये, विनयभरा मेरा आग्रह भी मानिये । तभी आकाशवाणी से आज्ञा सुनाई दी - ‘‘हे संत दादूजी ! भक्त के आग्रह अनुसार हाथी पर विराजिये ।’’ तत्रस्थ सभी संत सेवकों ने आकाशवाणी सुनी । तद्नुसार श्री दादूजी सेवकों द्वारा लाये गये हाथी पर विराजे । अन्य संत - साधु रथों पर बैठकर संग - संग चलने लगे । इस समय भक्त नारायणसिंह की भक्ति व प्रीति का पार नहीं था । वह हाथ में चामर लेकर गुरुदेव पर ढुला रहा था ॥१३॥
*सारे शिष्य साथ -* 
दास गरीब तथा मसकीन जु, 
हैं जगजीवन जू जगन्नाथा । 
वो बखना घड़सी जु गुपाल हिं, 
माधव टीलहिं शंकर साथा ॥ 
दौन्युँ प्राग रू जैमल रज्जब, 
चांदुजि मोहन तीन सुनाथा । 
माखुजि जैन नारायण दमोदर, 
सागर चारण श्याम सु हाथा ॥१४॥ 
संत मंडली में इस समय गरीबदास, मसकीन दास, जगजीवन जी, जगन्नाथजी, बखनाजी, घड़सीदास जी, गोपालदास, माधवदास, टीलाजी, शंकरदास, दोनों प्रयागदास, जैमल, रज्जबजी, चाँदूजी, तीनों मोहनदास, माखूजी, चैन जी, नारायण, दामोदर सागर - चारण और श्यामदास साथ चल रहे थे ॥१४॥
(क्रमशः)

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