मंगलवार, 16 सितंबर 2014

*सीकरी प्रसंग २५ वां दिन ~*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*सीकरी प्रसंग २५ वां दिन ~*
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२५ वें दिन अकबर ने पू़छा - गत दिन चार मुक्तियों में से सालोक्य को तो मैं समझ गया किन्तु अन्य ठीक समझ में नहीं आई है । अतः आज उनको ही समझाइये । तब दादूजी ने अकबर का तीन मुक्तियों के सम्बन्धी स्पष्ट प्रवचन करके समझाया । अकबर ने पू़छा - अद्वैत ब्रह्म को व्यापक कैसे माना जाता है ?
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दादूजी ने कहा -
*जियें तेल तिलन में, जियें गंध फूलन्न ।*
*जियें माखण क्षीर में, इयें रब्ब रहन्न ॥५॥*
(विचार अंग १८)

प्राणी मांही पैसकर, देखे दृष्टि उधार ।
जलाबिंब सब भर रहा, ऐसा ब्रह्म विचार ॥८३॥
(परिचय अंग ४)

इत्यादिक ब्रह्म के व्यापकता के द्योतिक वचन सुनाकर सत्संग समाप्त कर दिया ।
(क्रमशः)

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