मंगलवार, 16 सितंबर 2014

*सीकरी प्रसंग २६ वां दिन*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*सीकरी प्रसंग २६ वां दिन ~*
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२६ वें दिन अकबर ने कहा - भगवन् ! मैं सालोक्यादि चार मुक्तियों को तो समझ गया हूं किन्तु आप ने जीवनमुक्ति और विदेह मुक्ति का भी नाम उच्चारण किया था । अतः आज उन दोनों का ही प्रवचन करने की कृपा करें ? दादूजी ने कहा - जीवन्मुक्ति और विदेह मुक्ति में भेद तो नहीं है किन्तु सुख की अधिकता और न्यूनता से ही दो नाम कहे गये । जीवन्मुक्ति -
*दादू मृतक तब जानिये, जब गुण इन्द्रिय नांहि ।*
*जब मन आपा मिट गया, तब ब्रह्म समाना मांहिं ॥२२॥*
(जीवि. मृ. अं. २३)
जीवित छूटे देह गुण, जीवत मुक्ता होय ।
जीवित काटे कर्म सब, मुक्त कहावे सोय ॥३०॥
(सजीवन अंग २६)
इत्यादिक अनेक साखियां सुनाकर फिर ५१ पद -
५१. संजीवनी । पंचम ताल
राम विमुख जग मर मर जाइ, जीवैं संत रहैं ल्यौ लाइ ॥टेक॥
लीन भये जे आतम रामा, सदा सजीवन कीये नामा ॥१॥
अमृत राम रसायन पीया, तातैं अमर कबीरा कीया ॥२॥
राम राम कह राम समाना, जन रैदास मिले भगवाना ॥३॥
आदि अंत केते कलि जागे, अमर भये अविनासी लागे ॥४॥
राम रसायन दादू माते, अविचल भये राम रंग राते ॥५॥
फिर ५२ का पद भी -
५२. पंचम ताल
निकटि निरंजन लाग रहे, तब हम जीवित मुक्त भये ॥टेक॥
मर कर मुक्ति जहाँ जग जाइ, तहाँ न मेरा न पतियाइ ॥१॥
आगे जन्म लहैं अवतारा, तहाँ न मानै मना हमारा ॥२॥
तन छूटे गति जो पद होइ, मृतक जीव मिले सब कोइ ॥३॥
जीवित जन्म सुफल करि जाना, दादू राम मिले मन माना ॥४॥
फिर कु़छ साखियां भी कथन करके जीवन्मुक्ति को समझ दिया । फिर विदेह मुक्ति को समझाने के लिये दादूजी ने ३५ का पद -
३५. परिचय सत्संग । दीपचन्दी ताल
सत्संगति मगन पाइये,
गुरु प्रसादैं राम गाइये ॥टेक॥
आकाश धरणी धरीजे, धरणी आकाश कीजे,
शून्य माहिं निरख लीजे ॥१॥
निरख मुक्ताहल मांहैं साइर आयो,
अपने पिया हौं ध्यावत खोजत पायौ ॥२॥
सोच साइर अगोचर लहिये,
देव देहुरे मांही कवन कहिये ॥३॥
हरि को हितार्थ ऐसो लखै न कोई,
दादू जे पीव पावै अमर होई ॥४॥
यह पद सुनाया ।
फिर कहा - जहँ मन राखे जीवता, मरतां तिस घर जाय ।
दादू वासा प्राण का, जहँ पहले रहा समाय ॥९९॥
जिसकी सुरति जहाँ रहे, तिसका तहँ विश्राम ।
भावे माया मोह में, भावे आतम राम ॥९८॥
(मन अंग १०)
इत्यादिक साखियां सुनाकर सत्संग समाप्त कर दिया ।

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