मंगलवार, 30 सितंबर 2014

= १२१ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
सहज विचार सुख में रहै, दादू बड़ा विवेक । 
मन इन्द्रिय पसरै नहीं, अंतर राखै एक ॥ 
नाना विधि पिया राम रस, केती भॉंति अनेक । 
दादू बहुत विवेक सौं, आत्म अविगत एक ॥ 
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Gauri Mahadev ~ 
नारायण । फूल खिलने पर भौँरोँ को निमन्तत्रण नहीँ देना पडता । इसी प्रकार साधक "साधनचतुष्टय" सिद्ध हो जाने पर ज्ञान के साधन स्वयं उपस्थित हो जाते हैँ । साधनचतुष्टय से असम्पन्न साधक मेँ न ब्रह्मविद्या उत्पन्न होगी और न स्थिर । ऐसी एक प्राचीन लोकोक्ति है कि - शेरनी का दूग्ध स्वर्णपात्र मेँ ही दुह कर इकट्ठा किया जा सकता है । 

वैराग्यहीन प्रथम तो भगवान् श्रीसाम्ब सदाशिव शंकर के स्वरूप को समझ ही नहीँ पायेगा और समझ भी गया तो राग से गिर जायेगा । श्रुतिभगवती स्पष्ट रूप से कहती है - "न प्रवेदयन्ति रागात्" (मुण्डकोपनिषद्) । दुःखानुभव से यद्यपि वितृष्णा उत्पन्न होती है, वैराग्य उत्पन्न नहीँ होता, नारायण ।

वैराग्य तो विवेक का फल है । और विवेक शब्द का अर्थ ही होता है अलग करना । विकेक के द्वारा राग से अलग होना । विवेक के तलवार के राग को काटना । नर विषयोँ को बाहिर ढुँढ कर वहाँ न पाकर, गेँद (कन्दुक) की दीवाल मेँ ठोकर खाकर वापिस आने की तरह, आत्मत्त्व मेँ जब लौटना है तभी वास्तविक वैराग्य माना जाता है ।

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