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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*बसी प्रसंग*
१३४. काल चेतावनी । पंचम ताल
बटाऊ ! चलना आज कि काल ।
समझि न देखे कहा सुख सोवे, रे मन राम संभाल ॥टेक॥
जैसे तरुवर वृक्ष बसेरा, पंखी बैठे आइ ।
ऐसैं यहु सब हाट पसारा, आप आपको जाइ ॥१॥
कोइ नहिं तेरा सजन संगाती, जनि खोवे मन मूल ।
यहु संसार देखि जनि भूलै, सब ही सैंबल फूल ॥२॥
तन नहिं तेरा धन नहिं तेरा, कहा रह्यो इहि लाग ।
दादू हरि बिन क्यों सुख सोवे, काहे न देखे जाग ॥३॥
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दादूजी शिष्यों सहित बसी के तालाब पर विराजे थे, उन्हीं दिनों में एक दिन दो यात्री वहां आये थे । उनमें एक गुजराती नागर ब्राह्मण था । वह काशी की यात्रा करने जा रहा था और दूसरा मुलतान निवासी निजाम नामक मुसलमान था । वह अजमेर सूबा के उच्चपदाधिकारी थे । उनको सहसा वैराग्य हो जाने से घर से निकलकर आगरा की ओर घूमकर मक्का की यात्रा करने की इच्छा से लौटे थे । दोनों यात्री बसी के तालाब पर सायंकाल आये थे और वहां ही ठहर गये थे और परस्पर बातें करते करते निद्रा के वश हो गये थे । सूर्योदय पर नहीं उठे तब दादूजी ने उनको उठाने के लिये उक्त १३४ का पद बोला था । तब वे उठ कर दादूजी के पास आये ।
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दादूजी ने पू़छा - आप लोग कहां जाओगे । तब उन्होंने अपना उक्त परिचय दिया । तब दादूजी ने कहा - मक्का और काशी तो तुम्हारे शरीर में ही हैं । यह कह कर निज़ाम को ३५२ का पद -
३५२.(सिंधी) निज स्थान निर्णय । उपदेश एकताल
अर्श इलाही रब्बदा, इथांई रहमान वे ।
मक्का बीचि मुसाफरीला, मदीना मुलतान वे ॥टेक॥
नबी नाल पैगम्बरे, पीरों हंदा थान वे ।
जन तहुँ ले हिकसा ला, इथां बहिश्त मुकाम वे ॥१॥
इथां आब जमजमा, इथांई सुबहान वे ।
तख्त रबानी कंगुरेला, इथांई सुलतान वे ॥२॥
सब इथां अंदर आव वे, इथांई ईमान वे ।
दादू आप वंजाइ बेला, इथांई आसान वे ॥३॥
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यह पद सुनाकर समझाया और नागर को ३५३ का पद -
३५३.(पंजाबी) क्रीड़ा ताल खंडनि
आसण रमदा रामदा, हरि इथां अविगत आप वे ।
काया काशी वंजणां, हरि इथैं पूजा जाप वे ॥टेक॥
महादेव मुनि देवते, सिद्धैंदा विश्राम वे ।
स्वर्ग सुखासण हुलणैं, हरि इथैं आत्मराम वे ॥१॥
अमी सरोवर आतमा, इथांई आधार वे ।
अमर थान अविगत रहै, हरि इथैं सिरजनहार वे ॥२॥
सब कुछ इथैं आव वे, इथां परमानन्द वे ।
दादू आपा दूर कर, इथांई आनंद वे ॥३॥
यह पद सुनाकर समझाया । फिर उन दोनों ने कहा - आपका उपदेश तो अति उत्तम है किन्तु पेट की चिन्ता से इसका होना तो कठिन ही ज्ञात होता है ।
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तब दादूजी ने ३४२ का पद -
३४२. गजताल
सोई राम सँभाल जियरा, प्राण पिंड जिन दीन्हा रे ।
अम्बर आप उपावनहारा, मांहि चित्र जिन कीन्हा रे ॥टेक॥
चंद सूर जिन किये चिराका, चरणों बिना चलावै रे ।
इक शीतल इक तारा डोलै, अनन्त कला दिखलावै रे ॥१॥
धरती धरनि वरन बहु वाणी, रचिले सप्त समंदा रे ।
जल थल जीव सँभालनहारा, पूर रह्या सब संगा रे ॥२॥
प्रकट पवन पानी जिन कीन्हा, वरषावै बहु धारा रे ।
अठारह भार वृक्ष बहु विधि के, सबका सींचनहारा रे ॥३॥
पँच तत्त्व जिन किये पसारा, सब करि देखन लागा रे ।
निश्चल राम जपो मेरे जियरा, दादू तातैं जागा रे ॥४॥
सुनाकर एक सिद्ध पात्र देकर कहा - आप दोनों टहटड़े ग्राम के पर्वत में जाकर निर्गुण ब्रह्म का भजन करो । पद्धति भी बतादी और कहा - पात्र को सुरक्षित रखना भूख लगे तब इसे सीधा रखकर एक श्वेत शुद्ध वस्त्र से ढँक दिया करो । फिर थोड़ी देर में तुम्हारी इच्छा के अनुसार इसमें सात्विक भोजन आ जाया करेगा । भोजन पाकर पात्र ऊंधा रख दिया करो और उक्त प्रकार परब्रह्म के ध्यान में लगे जाया करो । यह पात्र टहटड़े में हो भोजन देगा, अन्य स्थानों में जाने पर नहीं देगा । फिर वे दोनों टहटड़े जाकर ब्रह्म भजन करने लगे । ये ५२ शिष्यों में हैं ।
(क्रमशः)
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