मंगलवार, 30 सितंबर 2014

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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन* द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग गौड़ी १(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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६. विरह हैरान । त्रिताल
अजहूँ न निकसैं प्राण कठोर ।
दर्शन बिना बहुत दिन बीते, 
सुन्दर प्रीतम मोर ॥टेक॥
चार पहर चारों युग बीते, 
रैनि गँवाई भोर ।
अवधि गई अजहूँ नहिं आये, 
कतहूँ रहे चित - चोर ॥१॥
कबहूँ नैन निरख नहिं देखे, 
मारग चितवत तोर ।
दादू ऐसे आतुर विरहनी, 
जैसे चंद चकोर ॥२॥
टीका ~ विरहीजन कहते हैं कि परमेश्‍वर के वियोग में हमारे ये कठोर प्राण अभी तक भी नहीं निकल रहे हैं, क्योंकि परमेश्‍वर के दर्शनों के बिना, आयु के बहुत दिन समाप्त हो चुके हैं । हे हमारे सुन्दर प्रीतम ! अब हम क्या करें ? 
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हे प्यारे ! यह चार पहर दिन, चारों युग के समान हम बिता रहे हैं । और उम्र रूपी रात्रि आपके दर्शनों के बिना खत्म होती जा रही है । दर्शन करने को जवानी थी, वह बीत गई । आपने अभी तक भी दर्शन नहीं दिये । हे हमारे चित्त को चुराने वाले प्रभु ! आप कहाँ रह गये ? 
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ब्रह्मऋषि कहते हैं कि आपके विरहीजन तो आपके दर्शनों के बिना ऐसे व्याकुल हो रहे हैं, जैसे अमावस्या के दिन चन्द्रमा के दर्शन किये बिना चकोर व्याकुल रहता है ।
सोच सुमंत विकल दुख दीना । 
धिग जीवन रघुवीर विहीना ॥
रहिहिं न अंत हुँ अधम सरीरू । 
जसु न लहेउ विछुरत रघुवीरू ॥
भए अजस अघ भाजन प्राना । 
कवन हेतु नहि करत पयाना ॥
अहह ! मंद मनु अवसर चूका । 
अजहुं न हृदय होत दुई टूका ॥
रक्त नैन पाती लिखूं, 
जे बस होय हमार ।
अक्षर हो कागज चढ़ूं, 
दरशन करूं निहार ॥६॥
इस मन को कागज करूं, 
लेखनी करूं स्वजीव ।
रोय लिखूं इन पलक सूं, 
को बांचे बिन पीव ॥६॥
Even now this cruel life does not part from me.
A long time has passed without seeing You,
O my handsome Beloved.
The four watches of night have passed like four aeons;
thus was the night spent till dawn.
The promised time has passed, and yet He came not.
Why is the thief of my heart delayed?
My eyes have never seen You;
they are looking intently Your way.
Your separated lover is as eager as the moon-bird
for the moon, O Dadu.
(English translation from "Dadu~The Compassionate Mystic" by K. N. Upadhyaya~Radha Soami Satsang Beas)
(क्रमशः)

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