#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
दादू सब ही मृतक समान हैं, जीया तब ही जाण ।
दादू छांटा अमी का, को साधु बाहे आण ॥
सबही मृतक ह्वै रहे, जीवैं कौन उपाइ ।
दादू अमृत रामरस, को साधू सींचे आइ ॥
सब ही मृतक देखिये, क्यों कर जीवैं सोइ ।
दादू साधु प्रेम रस, आणि पिलावे कोइ ॥
सब ही मृतक देखिये, किहिं विधि जीवैं जीव ।
साधु सुधारस आणि करि, दादू बरसे पीव ॥
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साभार : Vipin Tyagi ~
यह कबीर साहिब के वचनों पर पांचवी पोस्ट है । हम कबीर साहिब की वाणी की अन्तर की मंजिलों के बारे में चर्चा कर रहे थे । बीच में हमने सतारा के महान सन्त तुलसी की वाणी ली थी जो मरने के बाद का हाल वर्णन कर रहे थे ।
अब नरकंन का सुनो सुभावा ।
कर्मी जीव सहें दुःख दावा ॥
जब यमदूत आत्मा को धर्मराज के पास ले गए तो उसने चित्रगुप्त से हिसाब लेकर नरकों में डाल दिया । आगे नरकों का दुःख सुनों ।
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कुम्भी नरक निदान यह, पड़े जीव जब जाये ।
सिर समेत बूडा रहे, सदा नरक के माहि ॥
कुल अठ्ठाइस नरक हैं । इसमें कुम्भी नरक महा भयानक और मल से भरपूर हैं । कुम्भ घड़े को कहते हैं । कुम्भी घड़े की शक्ल का एक बहुत ही विशाल नरक है । इसमें बुरी से बुरी गन्ध आती है; मल-मूत्र आदि से भी गंदी बदबू आती है । जीव को इसमें फैंक देते हैं । उसमें मलिन आत्माओं को गोते दिए जाते हैं ।
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जबकि नरक सिर पर काढ़े ।
जिव ऊपर जूती जम मारे ॥
डूबा रहे नर्क के माहीं ।
सिर काढ़े जम मारे भाई ॥
यह स्थूल शरीर तो यहाँ जल जाता है, परन्तु वहाँ पर जो शरीर है वह सूक्ष्म है, जैसा कि स्वपन के समय होता है पर यह अवस्था जाग्रत अवस्था से ज्यादा चेतन होती है । जब वह जीव उस मलिन नरक से सिर उठाने का प्रयत्न करता है तो ऊपर से यमदूत जूते मारते हैं, डंडे मारते हैं और उसे फिर डुबों देते हैं ।
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कुम्भी नर्क कल्प लौं रहे बासा ।
मुख में नर्क नाक में स्वाँसा ॥
कल्पों पर्यन्त अर्थात अनगिनत युगों तक वहीं रहना पड़ता है । फिर नरकों से निकाल कर चौरासी लाख योनियों में डाल देते हैं । कभी घास, कभी पेड़, कभी पक्षी, कभी जानवर । फिर कहीं मनुष्य की योनी मिलती है ।
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कई जुगन लौं रहे बिहाला ।
फिर अघोर नरक में डाला ।
अगर कर्म ज़्यादा ही भारी हैं तो इसे फिर कुम्भी नरक से निकाल कर घोर नरक में डाल दिया जाता है । इस घोर नरक के दुःख, उस कुम्भी नरक के दुखों से कहीं ज़्यादा दुखदाई हैं । घोर नरक में इसे जलाया जाता है । जीव को सूक्ष्म शरीर देकर (क्योंकि स्थूल शरीर तो यहीं मातलोक में जला दिया जाता है) जलाया जाता है और सज़ा दी जाती है ।
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यहि विधि जक्त चलाई बाटा ।
इन भुलाय दीन्हा घर घाटा ॥
इस त्रिलोकी रूपी भँवर में आकर जीव को कुछ भी ज्ञान नहीं रहा कि उसका असली घर कहाँ है, वहाँ कैसे पहुंचा जाये । मालिक कौन है, कहाँ है और कैसे मिलता है । यदि सन्त आकर हकीकत बताते हैं तो दुनिया मानती नहीं है । आखिर क्यों ? क्योंकि दुनिया झूठ के रथ पर सवार है । झूठ से ही मन का मसाला बना है । दुनिया का सारा व्यवहार ही झूठ पर आधारित है ।
एक पण्डित ने अपने चेले से कहा कि सदा सच बोलो । चेले ने कहा, "यह तो असम्भव है क्योंकि सच कडवा लगता है । अगर मैं किसी आफत में पड़ गया तो कौन बचाएगा ? पण्डित जी बोले, "अगर कुछ गड़बड़ हुई तो मैं संभाल लूँगा ।"
चेला बोला, "ठीक, पण्डित जी ! उसी गाँव में एक जाट एक शादी-शुदा औरत को भगाकर लाया था । उस औरत की एक जवान लडकी थी । चेला जब भिक्षा लेने गाँव में निकला तो जाट का घर बीच में पडा । चेले ने जाट के घर जाकर कहा, "उठ री ! भगाई हुई की लडकी ! मुझे रोटी दे । उस लडकी ने माँ से कहा, माँ ने जाट से कहा । बस क्या था, जाट ने लठ्ठ निकाला और चेले के पीछे भागा । चेला दौड़ता हुआ पण्डित जी के पास गया और बोला, "मुझे बचाओ ।"
अब पण्डित जी घबरा गये, सोचा जाट खोपड़ी है, यह मेरी दलील सुनने से पहले मुझ पर भी एक-दो लाठी जड़ सकता है । चेले से बोले, "भई ! इस वक़्त तो मेरी बुद्धि भी काम नहीं कर रहे, इस वक़्त तो बचाव कर ले, चाहे झूठ बोल कर सही । चेला जाट के पास गया और बोला, "हे दयालु जजमान ! आप जैसा भला और अच्छा आदमी तो दुनिया में चिराग ढूँढने से भी नहीं मिलेगा ।" जाट ठण्डा हो गया और बोला, "क्यों रे ! घर में मेरी लडकी से क्या बोला ?" कहने लगा, "जजमान ! मैंने उस समय भाँग चढ़ा रखी थी । मुझे तेज भूख लगी थी, नशे की हालत में होश नहीं था । आप जैसा चरित्रवान तो ढूँढने से भी नहीं मिलेगा । आपने दो अबला स्त्रियों को उनके निर्दयी परिवार से बचाकर उन्हें सहारा दिया । आप धन्य हैं, यजमान ! जाट उसको घर ले गया और लडकी को बोला, "दे ससुरे को रोटी !" रोटी खाकर पण्डित जी के पास आकर बोला, "देखो ! मैंने झूठ बोलकर जान बचा ली ।" सो इस संसार में झूठ ही झूठ है ।
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सन्त छाप जेहि जिव पै लागी ।
कोई जिव भूलि गया अनुरागी ॥
कुसंगति से भूल समानी ।
जाकी कहूं सुनो सहदानी ॥
अगर सन्तों ने किसी को राम-नाम का दान किया हो, अपनी मुहर उस पर लगा दी हो, परन्तु यदि खोते कर्मों के कारण बुरी संगति में पड़कर भूल गया, गुरु को छोड़ दिया, नाम को भी छोड़ दिया, प्रेम-प्रीति को भी छोड़ दिया तो उसका क्या हाल होगा ? वह कुसंगति में फँसकर भटक गया । वैसे जीव प्रेमी ज़रूर होगा, यदि प्रेमी नहीं होता तो उसे नाम की बख्शीश न मिलती । अब आगे उसका हाल बताते हैं ।
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जो कदाचि नरक में जावे ।
सन्त जाय के जहाँ छुडावें ॥
सबसे पहले पूर्ण सन्त के शिष्य नरक में जाता ही नहीं और न ही धर्मराज उसे नरक में स्वीकार करता है । अगर भूले-भटके वह चला भी जाये तो सन्त को नरक में जाकर अपने शिष्य को निकालना पड़ता है ।
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मोहर छाप के काज सिधावें ।
नरक माहिं वे जीव छुडावें ॥
पुत्र चाहे कितना भी बुरा हो, पिता को उसकी लाज होती है । इसी प्रकार जिस सन्त ने राम-नाम दिया है, वह अपने बिरद की लाज रखकर शिष्यों को छुड़ाता है । यदि बेटा गुनाह करेगा तो बाप सजा देगा, लेकिन पुलिस के हवाले नहीं करेगा । सन्त इसके बुरे कर्मों की सजा आप दे देते है, धर्मराज के हवाले नहीं करते । वह सजा देकर फिर गले लगा लेते हैं । जिस प्रकार बच्चा अगर गन्दगी से लथपथ है, माँ को उसे गोद में लेना है । वह पहले उसे धो लेगी, फिर गोद में उठायेगी । अगर बुरे कर्म शिष्य ने किये हैं तो सतगुरु को पहले उसे साफ़ करना है, बिना साफ़ किये नहीं ले जायेंगें । सन्त जीव को सजा देकर फिर बख्श लेते हैं ।
अगर कोई शिष्य राम-नाम को ग्रहण करके गुरु से विमुख हो जाता है, सन्तों की निन्दा करता है, बुरे कर्म में लिप्त हो जाता है तो फिर धर्मराज उसकों नर्क में डाल सकता है । वैसे धर्मराज सन्तों के जीवों को लेता ही नहीं है लेकिन अगर ले लिया तो सन्तों को उन्हें छुडाने के लिए वहाँ जाना पड़ता है, और वे नरक को ठण्डा कर देते हैं । गुरु नानक साहिब इस की मिसाल हैं । अगर आप सोदर पौड़ी पढेंगें तो उसमें ज़िक्र है कि किस तरह गुरु नानक साहिब ने अपने अँगुठा डुबो कर नरक को शान्त कर दिया । इसी तरह राजा जनक ने अढाई घड़ी के सुमिरन का फल देकर नरक को ठण्डा कर दिया ।
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धन-धन राजा जनक है,
जिन सिमरन किया विवेक ।
एक घड़ी के सुमिरते, पापी तरे अनेक ॥
राजा जनक सन्त नहीं, योगीश्वर ज्ञानी थे । जनक मृत्यु के बाद जब अपने धाम जा रहे थे तो रास्ते में नरकों के जीवों की पुकार सुनी । कहा, "मैं आगे नहीं जाता, पहले इनको मुक्त करो ।" गण (यमदूत) धर्मराज के पास गये और सारी बात सुनायी । धर्मराज आया और कहने लगा, "इनके बदले कुछ मुआवजा देना पडेगा ।" वहाँ राजा जनक ने बैठकर अढाई घड़ी के सुमिरन का फल दिया, वह सब नरक से मुक्त हो गये । यह बड़े लोगों की नेकी है, परोपकार है ।
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ऐसा सुमिरन जान के, संत न पकड़ी टेक ।
नानक सुमिरन सार है, बिसरे घड़ी न एक ॥
राजा जनक का सुमिरन 'विवेक' था, 'ज्ञान' था । सन्तों का सुमिरन ऐसा नहीं, बल्कि आन्तरिक है । इसीलिए कहा है कि सन्तों ने 'विवेक' सुमिरन का आश्रय नहीं लिया, उनका सुमिरन 'सार राम-नाम शब्द' है । ब्रह्म का 'अनहद' शब्द है, पारब्रह्म से पार सचखण्ड में जाकर 'सार राम-नाम' शब्द है । गुरु नानक साहिब का ज्ञान 'सार शब्द' का है ।
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सतगुरु सन्त दयाल से, कर्म की रेख मिटी जाय ।
मन तन सूरति साँच से, ज्यों को त्यों रहि जाय ॥
सन्त कर्मों की रेख मिटा देते हैं; इस प्रकार नहीं जैसे लोग कहते हैं, बल्कि इस प्रकार कि उसके प्रारब्ध को नहीं छेड़ते । वे कहते हैं कि अपने प्रारब्ध को प्यार के साथ भुगत ले । सो प्रारब्ध तो भोगने से समाप्त हो गया । बाकी क्रियमान कर्म, जो यह रोज़ करता है, उसके फल की आशा न रखे । जो संचित कर्म हैं, वो ब्रह्म पद में रहते हैं । जब अभ्यास किया और आत्मा ब्रह्म पद पर पहुँची, वहाँ राम-नाम के प्रभाव से वे नष्ट हो जाते हैं । इस प्रकार सन्त आत्मा को निर्मल करके आगे ले जाते हैं ।
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तक सूर सन्मुख दृष्टी धरी कर, नेह निशाने पै गडी ।
सूरति सिखर के पार होई कर, कँवल पखड़ी से कड़ी ॥
आत्मा को राम-नाम में लगा दो, दृष्टि को प्रकाशवान स्वरुप में लगा दो । जब यह निशाना सध जाये, तो फिर सुरत को कमल में लगा दो । यह कमल दसवें द्वार में मानसरोवर या अमृतसर में है । अब ये बाहर के मानसरोवर या अमृतसर का ज़िक्र नहीं है ।
गुरु रामदास जी ने जब बाहर अमृतसर तैयार करना चाहा तो मिस्त्री को बुलाकर नक्शा समझाया । जब वह न समझ सका, तो अपनी तवज्जह देकर उसे दसवें द्वार में ले गये, वहाँ उसने अमृतसर का रूप देख लिया । लेकिन जब बाहर अमृतसर बनाया तो कमल तैयार न कर सका, उसकी जगह पानी में हरमंदिर बना दिया । यह हरमंदिर कमल की नक़ल है ।
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ऐसे हिरदे सन्त सुभावा ।
भवजल पार लगावें थावां ॥
सन्तों का काम है जीवों को भवसागर से पार करवाना । वे दया लेकर आते हैं, उनका ज़हूर(प्रकट होना) जीवों को पार कराने के लिए होता है । वे धर्म और जाति बनाने के लिए नहीं आते । पहले ही धर्म और जातियाँ क्या कुछ कम हैं ! परन्तु जब सन्त उपदेश देकर चले जाते है, दुनिया के लोग छोटे-छोटे दायरे बना लेते हैं और परमार्थ को मज़हब के रंग में डुबो देते हैं । नतीज़ा यह होता है कि लोग एक-दूसरे से नफरत करने लग जाते हैं । गुरु नानक का उपदेश पूरे विश्व के लिए था, सिर्फ सिखों के लिए नहीं । गुरुवाणी में लिखा है:
खत्री ब्राह्मण सूद वैस उपदेस चौंह वरना को सांझा ।
गुरुमुख नाम जपै उधरे सो कल मह घट घट नानक माझा ॥
सारा संसार रोजगार के हिसाब से चार वर्णों में बाँटा जा सकता है । गुरु नानक का उपदेश चारों वर्णों के लिए है, पूरे आलम के लिए है । फिर कलियुग में जीवों के उद्धार के लिए केवल राम-नाम है, जो हरेक के घट में गूँज रहा है ।

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