#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
एक तत्त्व ता ऊपर इतनी, तीन लोक ब्रह्मंडा ।
धरती गगन पवन अरु पानी, सप्त द्वीप नौ खंडा ॥
चंद सूर चौरासी लख, दिन अरु रैणी,
रच ले सप्त समंदा ।
सवा लाख मेरु गिरि पर्वत, अठारह भार,
तीर्थ व्रत ता ऊपर मंडा ।
चौदह लोक रहैं सब रचना, दादू दास तास घर बंदा ॥
दादू जिन यहु एती कर धरी, थंभ बिन राखी ।
सो हम को क्यों बीसरै, संत जन साखी ॥
अनेक चंद उदय करै, असंख्य सूर प्रकास ।
एक निरंजन नांव बिन, दादू नहीं उजास ॥
दादू जिन मुझ को पैदा किया, मेरा साहिब सोइ ।
मैं बन्दा उस राम का, जिन सिरज्या सब कोइ ॥
इक लख चन्दा आण घर, सूरज कोटि मिलाय ।
दादू गुरु गोविन्द बिन, तो भी तिमिर न जाय ॥
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साभार : Ramjibhai Jotaniya ~
तीन लोक, चौदह भुवन और
नौ खंड मे सद्गुरु ने नाम
रूपी डोरी फेंकी हुयी है, यदि उस पर
हंसा नहीं चढ़ता, तो इसमे सद्गुरु
का क्या दोष है ?
सोलह काला पूर्ण
चंद्रमा, असंख्य
तारागण, बिजली तथा अनेक गैस
बत्तियों के होते हुए भी, जैसे सूर्य के
बिना रात्री के पूर्ण अंधकार का नाश
नहीं होता, वैसे ही अनेक यत्न करने पर
भी सद्गुरु के बिना अज्ञान रूपी अंधकार
नष्ट नहीं होता |

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