सोमवार, 15 सितंबर 2014

= बेली का अंग ३६(१०/१२) =

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टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*बेली का अंग ३६*
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*दादू अमर बेलि है आत्मा, खार समंदां मांहिं ।*
*सूखे खारे नीर सौं, अमर फल लागे नांहिं ॥१०॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! ‘अमर बेलि’ कहिए साधक की अन्तर्मुख वृत्ति, संसार में आसक्ति रखने वाली विषय - वासना रूपी खारे जल को पीकर आत्म - भावना की तरफ से सूख गई है । उस बुद्धिरूप बेलि के, ज्ञान अमृत रूप फल नहीं लगता है ॥१०॥ 
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*दादू बहु गुणवंती बेलि है, ऊगी कालर मांहिं ।*
*सींचै खारे नीर सौं, तातैं निपजै नांहिं ॥११॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! बुद्धि रूपी बेली बहुत गुणवान है, परन्तु विषय - वासना रूप कालर भूमि में स्थिर हो रही है और इन्द्रियों के विषय रूपी खारे नीर को पीकर क्षीण होती जाती है । वह बुद्धि ब्रह्म अनुसरणी नहीं बनती, इसीलिये अमर फल से वंचित रहती है ॥११॥ 
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*बहु गुणवंती बेली है, मीठी धरती बाहि ।*
*मीठा पानी सींचिये, दादू अमर फल खाहि ॥१२॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! मनुष्य की बुद्धिरूपी बेली बहुत गुणवान है । इसको सत्संग रूपी मीठी धरती में लगाइये और फिर निष्काम नाम - स्मरण रूपी मीठे जल से सींचिये । फिर उस बुद्धि रूप बेली का ज्ञान अमृत रूपी फल खाकर साधक जीवन मुक्त हो जाता है ॥१२॥
(क्रमशः)

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