卐 सत्यराम सा 卐
प्रेम लहर गह ले गई, अपने प्रीतम पास ।
आत्म सुन्दरी पीव को, विलसै दादू दास ॥
सुन्दरी को साँई मिल्या, पाया सेज सुहाग ।
पींव सौं खेलै प्रेम रस, दादू मोटे भाग ॥
दादू सुन्दरी देह में, साँई को सेवै ।
राती अपने पीव सौं, प्रेम रस लेवै ॥
दादू निर्मल सुन्दरी, निर्मल मेरा नाह ।
दोन्यों निर्मल मिल रहे, निर्मल प्रेम प्रवाह ॥
साँई सुन्दरी सेज पर, सदा एक रस होइ ।
दादू खेलै पीव सौं, ता सम और न कोइ ॥

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