卐 सत्यराम सा 卐
दादू विषय विकार सौं, जब लग मन राता ।
तब लग चित्त न आवई, त्रिभुवनपति दाता ॥
दादू क्या जाणों कब होइगा, हरि सुमिरण इक तार ।
क्या जाणों कब छाड़ि है, यहु मन विषै विकार ॥
है सो सुमिरण होत नहीं, नहीं सो कीजै काम ।
दादू यहु तन यूँ गया, क्यूँ कर पइये राम ॥

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