शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

#daduji

||दादूराम सत्यराम||
अमृत बेली बाहिये, अमृत का फल होइ ।
अमृत का फल खाइ कर, मुवा न सुणिया कोइ ॥ १३ ॥
टीका ~ हे जिज्ञासु ! अन्तर्मुख विवेक - बुद्धि रूप बेली को, निष्काम भक्ति में लगाइये, तो फिर उस बुद्धि रूप बेली के ज्ञानरूपी अमृत फल लगेगा । उसको भक्षण करने वाले उत्तम साधक, न तो कोई मरे हैं और न आगे मरेंगे । जीवन - मुक्त हो जावेंगे ॥ १३ ॥

दादू विष की बेली बाहिये, विष ही का फल होइ ।
विष ही का फल खाय कर, अमर नहिं कलि कोइ ॥ १४ ॥
टीका ~ हे जिज्ञासु ! बहिर्मुख बुद्धि रूप बेली कुसंग में लगी हुई है तो विषय रूपी जल को पीने से चौरासी में जीव जाते हैं । फिर चौरासी के दुःखों को भोगते रहते हैं । ऐसे जीव कलियुग में कभी भी अमर नहीं होते ॥ १४ ॥

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