🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*अबिहड़ का अंग ३७*
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दादू संगी सोई कीजिये, सुख दुख का साथी ।
दादू जीवन - मरण का, सो सदा संगाती ॥४॥
टीका - हे जिज्ञासु ! वह अविनाशी समर्थ परमेश्वर, सच्चा साथी है । उसी का संग कहिये शरणा लेना चाहिये । क्योंकि जन्म से मरण पर्यन्त, सुख - दुःख में वही इस जीव का साथ देता है और सदैव वह इसके साथ रहता है ॥४॥
‘जैमल’ जासौं प्रीति करि, जो जग अक्षै रु पास ।
ना वह मरै न बीछुरै, ना तुम होहु निरास ॥
मित्र मृग मूसा जिसे, काग कछू चहुँ यार ।
दुख सुख में बिहड़ै नहीं, त्यूं हरिजन हरि लार ॥
दृष्टान्त - कव्वा और मृग में गहरी मित्रता थी । सच्चे मित्र जानकर एक मूसा भी आकर उनका मित्र बन गया । चोथा कछुवा एक नदी के किनारे, इन तीनों से बोला - कि आप लोग भी, मुझे अपना मित्र बना लो । बना लिया । यह चारों आपस में सुख - दुःख में एक को एक साथ देते रहे । कभी भी मित्र से मित्र अलग नहीं हुए । इसी प्रकार हरिजन जो भक्त हैं, उनसे कभी भगवान भी अलग नहीं होते हैं । उनकी रक्षा करते है । यह दृष्टान्त पहले आ चुका है ।
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दादू संगी सोई कीजिये, जे कबहूँ पलट न जाइ ।
आदि अंत बिहड़ै नही, ता सन यहु मन लाइ ॥५॥
टीका - हे जिज्ञासु ! ऐसा साथी बनाइये, जिसका कभी परिवर्तन नहीं होता है । और काल द्वारा आदि से अन्त पर्यन्त, कभी भी नाश को नहीं प्राप्त होता । ऐसे सच्चिदानन्द स्वरूप, अधिष्ठान चेतन से अपना मन लगाइये ॥५॥
हरि सा मिंत मंडाण में, नाहिंन कहुँ कबीर ।
जत बिसरै बिसरै नहीं, स्वारथ बिना सधीर ॥
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दादू अबिहड़ आप है, अमर उपावनहार ।
अविनाशी आपै रहै, बिनसै सब संसार ॥६॥
टीका - हे जिज्ञासु ! आप सृष्टि रचयिता परमेश्वर अविनाशी, वह आप स्वयं न बदलने वाला है । और बाकी माया और माया का कार्य सम्पूर्ण संसार परिर्वतनशील है । उसी अमर पुरुष में अपने मन को लगाकर अमरभाव को प्राप्त होइये ॥६॥
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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*अबिहड़ का अंग ३७*
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दादू संगी सोई कीजिये, सुख दुख का साथी ।
दादू जीवन - मरण का, सो सदा संगाती ॥४॥
टीका - हे जिज्ञासु ! वह अविनाशी समर्थ परमेश्वर, सच्चा साथी है । उसी का संग कहिये शरणा लेना चाहिये । क्योंकि जन्म से मरण पर्यन्त, सुख - दुःख में वही इस जीव का साथ देता है और सदैव वह इसके साथ रहता है ॥४॥
‘जैमल’ जासौं प्रीति करि, जो जग अक्षै रु पास ।
ना वह मरै न बीछुरै, ना तुम होहु निरास ॥
मित्र मृग मूसा जिसे, काग कछू चहुँ यार ।
दुख सुख में बिहड़ै नहीं, त्यूं हरिजन हरि लार ॥
दृष्टान्त - कव्वा और मृग में गहरी मित्रता थी । सच्चे मित्र जानकर एक मूसा भी आकर उनका मित्र बन गया । चोथा कछुवा एक नदी के किनारे, इन तीनों से बोला - कि आप लोग भी, मुझे अपना मित्र बना लो । बना लिया । यह चारों आपस में सुख - दुःख में एक को एक साथ देते रहे । कभी भी मित्र से मित्र अलग नहीं हुए । इसी प्रकार हरिजन जो भक्त हैं, उनसे कभी भगवान भी अलग नहीं होते हैं । उनकी रक्षा करते है । यह दृष्टान्त पहले आ चुका है ।
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दादू संगी सोई कीजिये, जे कबहूँ पलट न जाइ ।
आदि अंत बिहड़ै नही, ता सन यहु मन लाइ ॥५॥
टीका - हे जिज्ञासु ! ऐसा साथी बनाइये, जिसका कभी परिवर्तन नहीं होता है । और काल द्वारा आदि से अन्त पर्यन्त, कभी भी नाश को नहीं प्राप्त होता । ऐसे सच्चिदानन्द स्वरूप, अधिष्ठान चेतन से अपना मन लगाइये ॥५॥
हरि सा मिंत मंडाण में, नाहिंन कहुँ कबीर ।
जत बिसरै बिसरै नहीं, स्वारथ बिना सधीर ॥
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दादू अबिहड़ आप है, अमर उपावनहार ।
अविनाशी आपै रहै, बिनसै सब संसार ॥६॥
टीका - हे जिज्ञासु ! आप सृष्टि रचयिता परमेश्वर अविनाशी, वह आप स्वयं न बदलने वाला है । और बाकी माया और माया का कार्य सम्पूर्ण संसार परिर्वतनशील है । उसी अमर पुरुष में अपने मन को लगाकर अमरभाव को प्राप्त होइये ॥६॥
(क्रमशः)

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