बुधवार, 10 सितंबर 2014

= ९१ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
दादू राम नाम निज मोहनी, जिन मोहे करतार । 
सुर नर शंकर मुनि जना, ब्रह्मा सृष्टि विचार ॥ 
दादू राम नाम निज औषधि, काटै कोटि विकार । 
विषम व्याधि थैं ऊबरै, काया कंचन सार ॥ 
दादू निर्विकार निज नांव ले, जीवन इहै उपाय । 
दादू कृतमम् काल है, ताके निकट न जाय ॥ 
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साभार : Shree Krishna 
महाराजा विक्रमादित्य के राज्य में एक बड़ा ही संतुष्ट ब्राह्मण जिसे किसी वस्तु की आवश्यकता अनुभव नहीं होती थी; अपने परिवार के साथ बड़े सुख से रह रहा था ! 
एक दिन उसकी धर्मपत्नी ने उसे जबरदस्ती घर से बाहर भेज दिया कि जाओ कुछ कमा कर लाओ ! ब्राह्मण बेमन घर से निकल कर तो सीधा जंगल की तरफ़ चल पड़ा है ! जंगल में जाते ही एक संत-महात्मा मिल गये हैं अत: उनके सामने अपनी व्यथा रखी है; कहा - महाराज मुझे किसी वस्तु की अभिलाषा नहीं है पर मेरी पत्नी ने जबरदस्ती भेज दिया है ! संत ने एक पत्र लिख कर उसे दे कर कहा- जाओ इसे जाकर राजा विक्रमादित्य को सौंप देना ! ब्राह्मण वह पत्र लेकर तो राजा के पास चला गया है ! 
पत्र में संत ने लिखा है - राजन आपको आध्यात्मिक शिक्षा लेने का बड़ा शौक था अब उसका समय आ गया है; इस ब्राह्मण को सारा राज्य सौंप कर तो मेरे पास चले आओ ! राजा ने तुरन्त वन को जाने की तैयारी कर ली है और सारा राजपाट उस ब्राह्मण को सम्भालने का आदेश दे दिया है ! 
ब्राह्मण सोचता है कि ऐसा उस संत के पास क्या है जो राजा के लिये राजपाट से भी कीमती है; जिसे राजा छोड़कर संत के पास जा रहा है !अवश्य ही उसके पास इससे भी कीमती वस्तु होगी जो यह राजा पाने को उतावला है ! ब्राह्मण राजा से कहता है - राजन् राजपाट सम्भालने से पहले मैं उस संत से एक बार भेँट करना चाहता हूँ ! 
आज्ञा पाकर ब्राह्मण उस संत के पास पहुँच गया है; जिज्ञासापूर्वक कहा - महाराज ऐसा क्या है जो राजा के पूरे राजपाट से भी बढ़कर है ? संत ने मुस्करा कर कहा - मेरे पास राम नाम है ! ब्राह्मण को बात समझ में आ गयी है; विनम्रता पूर्वक कहा - महात्मन मुझे भी यह राम-नाम ही दे दो मुझे राज पाट नहीं चाहिये ! 
इतनी ऊँची वस्तु है यह राम नाम साधकजनों; पर जो इसे भजता है वही इसका मूल्य जान पाता है अतः जुट जाइयेगा साधना में ! 
बहुत-२ मंगलकामनाये शुभकामनाये !

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