#daduji
||दादूराम सत्यराम||
ना हम करैं करावैं आरती, ना हम पिवैं पिलावैं नीर ।
करै करावै सांइयाँ, दादू सकल शरीर ॥ १५ ॥
टीका ~ हे जिज्ञासु ! मुक्तजन अन्तर्मुखी संत कहते हैं कि न तो हम बहिरंग आरती करते हैं, और न कराते हैं, वैसे ही न हम पीते हैं, और न पिलाते हैं । कर्ता करने वाला, कराने वाला, हमारे तो केवल अधिष्ठान चैतन्य ही है । वह सब शरीरों में सूत्र आत्मा रूप से व्यापक हो रहा है । ऐसे मुक्त पुरुष व्यष्टि अहंकार से रहित होकर समष्टि चेतन में अभेद हो गये हैं ॥ १५ ॥
करै करावै सांइयाँ, जिन दिया औजूद ।
दादू बन्दा बीच में, शोभा को मौजूद ॥ १६ ॥
टीका ~ हे जिज्ञासु ! मुक्त पुरुषों का निश्चय रूप यह व्यवहार है कि जिस समर्थ ने यह औजूद, शरीर दिया है, वही इसमें कर्ता कराने वाला आप है । अपने अनन्य दासों के अन्तःकरण में स्थित होकर, उनको संसार में शोभा दिलाते हैं, परन्तु वह अनन्य दास, अपने को कर्ता नहीं मानते ॥ १६ ॥
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