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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“एकविंशति तरंग” २९/३०)*
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*आठवें दिन सर्प नाग देव -*
यों करि बीतत सात दिनां तब,
ब्रह्महिं ध्यान करें गुरु दादू ।
आवत नाग तहाँ हरि प्रेरित,
संत कथा सुनिहँ सब साधू ।
आय सभी मधि शीश नवावत,
देखि अचम्भित है किम जादू ।
श्री गुरु चादर - छोर गहे मुख,
नाग चले सर - तीर अगादू ॥२९॥
इस प्रकार सात दिन बीत गये । गुरुदेव श्री दादूजी प्राय: ब्रह्म - ध्यान में लीन रहते । संत समाज भजन - स्मरण करते रहते । आठवें दिन सभी संत गुरुदेव के सम्मुख बैठे ज्ञान कथा सुन रहे थे, तभी सभा के मध्य हरि प्रेरणा से एक नाग आया । उसने श्री दादूजी के सम्मुख आकर शीश नवाया । जादू जैसा चमत्कार देखकर सभी स्तम्भित थे, तभी वह नाग गुरुदेव की चादर का छोर मुख में पकड़ कर चलने लगा ॥२९॥
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*आगे - आगे नाग पीछे श्री दादूजी और संत पानी के ऊपर थे -*
चालत ताल सरोवर - पश्चिम,
खेजड़ वृक्ष तले वह आई ।
पाछहिं संत सभी चलि आवत,
दादु दयालु चले अगुवाई ।
खेजड़ तीन दई परिदक्षिण,
मूल मही घुसि नाग बिलाई ।
स्वामि कहें - हरि प्रेरण जानहु,
ब्रह्महि धाम यहीं थरपाई ॥३०॥
तालाब के जल बीच में से दूसरे किनारे की तरफ बढ़ते हुये नाग आगे - आगे चल रहा था और श्रीदादूजी उसके पीछे और संत जैसे सांभर झील में जाया करते थे । तालाब के पश्चिमी किनारे पहुँच कर एक खेजड़ा वृक्ष के नीचे वह नाग श्री दादूजी को लेकर गया । पीछे - पीछे अन्य संत भी वहाँ आ पहुँचे । नाग ने खेजड़ा वृक्ष की तीन परिक्रमा की तीन बार फण पटका आवाज दी और यहां विराज कह कर गायब हो गया और फिर वहीं भूमि से गायब हो गया । यह देखकर स्वामी श्री दादूजी ने फरमाया - इस नागलीला को श्रीहरि की प्रेरणा समझना चाहिये । ब्रह्म धाम की स्थापना यहीं होगी वहा विचित्र औपरी लीला थी कोई जमाने में वहा युद्ध हुआ था, लोग बाग उधर बहुत कम जाते तीन दिन तक वह लीला रही, लोग बाग डरते थे, वह लीला का श्री दादूजी ने कल्याण कर दिया जगह सब शुद्ध हो गई, लोगबागों का आना शुरू हो गया ॥३०॥
(क्रमशः)

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