गुरुवार, 11 सितंबर 2014

= ९३ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
दादू सहजैं सुरति समाइ ले, पारब्रह्म के अंग ।
अरस परस मिल एक ह्वै, सन्मुख रहबा संग ॥ 
सुरति सदा सन्मुख रहै, जहॉं तहॉं लै लीन ।
सहज रूप सुमिरण करै, निष्कामी दादू दीन ॥
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!! श्री आचार्य चरणकमलेभ्यो नमः !!
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"भूमा - विद्या" के परम दाता "भगवन श्री सनत्कुमार"
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नारायण । महामुनी देवर्षि नाराद भगवान के परम भक्त एवं विद्वान होते हुये भी उस परम आनन्द का अनुभव नहीँ कर पा रहे थे । नारायण, भौतिक दृष्टि से प्रजापति ब्रह्मा के इस 'मानस पुत्र' को कोई दुःख हो यह संभव नहीँ । पुरुषोत्तम विष्णु के सर्वोत्कृष्ट भक्त और परम कृपापात्र कौन देव आधिदैविक दुःख से पीडित करने का दुःसाहस करता । परन्तु विचारशील के आध्यात्मिक दुःख को तो उतने से शान्ति नहीँ मिलती । 
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इसलिये भगवान सदाशिव - शंकर के पास वे जिज्ञासु बन कर गये । भगवान शंकर ने उन्हे अपने पुत्र 'स्कन्द' के स्वरूपभूत 'सनत्कुमार' के पास दीक्षा लेने को भेजा । नारायण, श्री सनत्कुमार स्वयं शंकर के शिष्य ही नहीँ ज्येष्ट भ्राता भी हैँ । सनत्कुमार उस समय हिमालय के "स्कन्दक्षेत्र" मेँ ध्यानमग्न बैठे थे । देवर्षि नारद ने स्कन्दक्षेत्र मेँ जाकर जहाँ श्री सनत्कुमार जी को 'दण्डवत् - प्रणाम' किया । श्री सनत्कुमार जी जो श्री साम्ब - सदाशिव शंकर के ध्यान मेँ मग्न थे तो शिव ध्यानस्थ श्री सनत्कुमार को प्रेरणा दी तो श्री सनत्कुमार जी यह कहते हुये – 
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गौरीशाय शंकराय शारदायै नमः ॥"
"शिव शिवाय नमः शम्भुवल्लभायै नमः ।
समाधि से उठ गये । श्री सनत्कुमार जी को अभी तक भी उस आनन्द का मद छाया हुआ था । नारायण , अपने सामने देवर्षि नारद को देख बड़े प्रेम से आलिँगन करते हुये - पुछने लगे "भाई ! कैसे आये ।" उस आलिँगन मात्र से मानो देवर्षि नारद के युगयुगान्तर के पाप नष्ट हो गये होँ ऐसा दिव्य हलकापना उन्हेँ अनुभव हुआ । महामुनि देवर्षि नारद को न ध्यान मेँ और न साकार दर्शन मेँ वह तृप्ति मिल पाई थी जो आज समाधिमग्न श्री सनत्कुमार जी के प्रेम से मिली । देवर्षि नारद कहने लगे - भगवन्। मुझे आप जिस तत्त्व के ध्यान मेँ मग्न थे उसका उपदेश करेँ ।
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कौथुमी शाखा के -छान्दोग्योपनिषद् मेँ सप्तम अध्याय मेँ संक्षिप्तरूप से उस संवाद का निरूपण किया है । वेदान्त मेँ वह सनत्कुमार विद्या या "भूमाविद्या" के नाम से प्रख्यात है । सनत्कुमार - "सन्" अर्थात् प्यार करना । नारायण, वैदिक संस्कृति मेँ सभी शिक्षा का आधार गुरु का शिष्य के प्रति प्रेम एवं करुणा तथा शिष्य का गुरु के प्रति श्रद्धा एवं शुश्रूषा ही स्वीकारा गया । गुरु शिष्य को "सौम्य" आदि शब्दोँ से सम्बोधित करते हैँ । 
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"सनत्" का अर्थ ब्रह्मा भी होता है । जो ब्रह्मनिष्ठ 'ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति' के न्याय से ब्रह्मस्वरूप बन गये हैँ वे ही "ब्रह्मविद्या" के अधिकारी माने गये हैँ । केवल वाचिक ज्ञान या शास्त्रोँ का ज्ञान दूसरे मेँ निष्ठा उत्पन्न करने मेँ समर्थ नहीँ । गुरु शिष्य के हृदय मेँ प्रवेश करता है । अतः गुरु की निष्ठा का ही शिष्य मेँ संचार होता है । अनुभवी गुरु ही शिष्य मेँ अनुभव का संचार कर सकता है । 
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"कुमार" अर्थात् खेलना । जो इस विश्व मेँ शिव शक्ति के क्रीडांगन मेँ, निरन्तर खेलता है, विलास करता है वही "कुमार" है । इस क्रीडांगन को जिन्होँने रोने का स्थान मान कर इससे भाग कर बचने को ही साध्य मान रखा है वे जीवन्युक्ति से अभी बहुत दूर हैँ । वेद के सिद्धान्त मेँ "सम्पूर्णँ जगदेव नन्दनवनं" सम्पूर्ण विश्व को देवों का उपवन बना देने का अद्भुत सामर्थ्य है ।
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नारायण । वेद के सिद्धान्त मेँ "सम्पूर्ण जगदेव नन्दनवन" सम्पूर्ण विश्व को देवों का उपवन बना देने का अद्भुत सामर्थ्य है ।
संसार के भौतिकवादी विश्व को दुःखसमेत स्वीकारते हैं क्योंकि जिस प्रकार बिना काँटे के गुलाब का फूल नहीँ मिल सकता उसी प्रकार बिना दुःख के सुख प्राप्ति उन्हें असम्भव लगती है । 
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धर्माभासी मत या मजहब और पन्थ संसार के दुःखोँ से धबराकर किसी विशेष लोकान्तर या अवस्था विशेष की कल्पना करते हैँ जिसमेँ संसार से बच जावेँगे । शुन्यवादी बौद्ध एवं न्याय वैशेषिकादि मत तो ज्ञान शुन्य एवं आनन्दशुन्य अवस्था को ही मोक्ष मान कर उसे पत्थर के समभाव को प्राप्त करा देते हैँ । "भगवान शंकरभगवत्पादाचार्य" तो इसीलिय इन्हेँ "वैनाशिक" और "अर्धवैनाशिक सम्प्रदाय" कहते हैँ । 
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संसार के सभी धर्मोँ और दर्शनों मेँ एक मात्र वेदान्त ही विश्व को दुःखरहितपरमानन्दानुभवरूप बनाने का दावा करता है । वेदान्त का दावा है कि "एकोमेवाद्वितीयं परमार्थता इदंबुद्धिकालेऽपि" (छान्दोग्योपनिषद्, श्री शांकरभाष्य) जिस काल मेँ दुःख एवं खण्डरूप से यह विश्व सामान्य जन्तु को प्रतीत होता है उसकाल मे भी अखण्ड परमानन्द रूप से ही वह स्थित है । 
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वैदिक ज्ञान केवल हमारी बुद्धि मेँ निर्मलता को लाकर हमेँ उसे अनुभव करने की सामर्थ्य देता है । जहाँ दुसरे मतवाले विश्व को दुःखमय बताते हैँ वेद हमारे मन के संस्कारोँ के कारण उसमेँ दुःखता की प्रतीति बताता है । स्कन्दरूप से शिवशक्ति के साक्षात् पुत्र भगवान् सनत्कुमार इसीलिये सनत् - चिरन्तन कुमार है कि वे इस आंगन मेँ सदा ही पुत्र भाव से खेलते रहते हैँ । 
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जो भी शिवशक्ति के कृपापात्र बनकर जीवन्मुक्ति के आनन्द मेँ रहते है । वे क्रीडा करने वाले ही शिवशक्ति पुत्र "स्कन्द" कहे जाते है एवँ वे ही ब्रह्मविद्या के वास्तविक उपदेशक बन सकते है । परन्तु इस प्रकार वे ही खेल सकते हैं जो कुमार हैँ । "कुत्सितो मारो येन स कुमारः" अर्थात् जिसने कामनाओँ को तिरस्कृत कर दिया वही "कुमार" है ।
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नारायण । कामनाओँ का मूल भेददर्शन है । अभेददर्शी मेँ कामनाओँ का अभाव स्वतः सिद्ध है । स्वतः अपनी कामना किसी को नहीँ होती । "सर्वैकत्वात्कामानुपपत्तेः" (बृहदारण्यक उपनिषद्, श्री शांकरभाष्यम्) कामना न होने पर शरीररूपी उपाधि के द्वारा दुःख भी सम्भव नहीँ । कामना के उदय होने पर कुमारत्व नष्ट हो जाता है । चित्त मेँ व्यभिचारता आ जाती है । फिर बालक की तरह खेलना संभव नहीँ । 
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लोक मेँ भी कुमार मेँ काम का अभाव प्रत्यक्ष है । कामुक बनने पर ही अहंकार का उदय होता है एवं तब युवा माना जाता है और माता -पिता के साथ पूर्व जैसा सहज खेलने का व्यवहार नहीँ रह जाता। विवाहोत्तर जिस प्रकार पत्नी से ही क्रीडा संभवती है उसी प्रकार अविद्या से ही जीवभाव मेँ क्रीडा करता है । इसी प्रकार शिवशक्ति के विषय मेँ समझना चाहिये । जिसकी अविद्या पत्नी नहीँ है वही जीवन्मुक्त कुमार कहा गया है । ऐसा नित्य विज्ञानानन्द मेँ स्थित ही ब्रह्मविद्या का प्रचार कर सकता है ।
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नारायण । "नारद" शिष्य भाव के प्रतीक है । "नार" अर्थात् ज्ञान को जो देता है वह नारद है । शिष्य वही है जो ज्ञान प्राप्त कर के उसका विस्तार करता है ।" आचार्यस्य प्रियं धनं आहृत्य प्रजा तन्तु मा व्यवच्छेत्सीः"(तै ॰ उ १.११) 
वेद भगवान् की आज्ञा है कि गुरु के प्रिय धन रूपी; विद्या को ग्रहण कर के ज्ञानसन्तति का उच्छेद न होने दे । जो केवल अपने तक ही ज्ञान को सीमित रखना चाहता है वह वास्तविक शिष्य नहीँ है । केवल अन्न या वाह्य भोगों को ही विषय नहीँ करता वरन् ज्ञान को भी स्वयं अपने तक ही सीमित रखने का वेद भगवान् निषेध करते हैँ । इसलिय काठकसंहितोपनिषद् मेँ प्रार्थना की गई है - "तेजस्वि नावधीतमस्तु" ।
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हमारा किया हुआ अध्ययन वीर्यवाला बने । जिस प्रकार वीर्यहीनसंतति कुल के लिये व्यर्थ है वैसे ही विद्या को भी समझना चाहिये । वैदिक संस्कृति के पतन काल मेँ विद्या को स्वयं अपने तक सीमित रखने के भ्रान्त स्वार्थ ने एक आदर्श का रूप ले लिया । "गोपाय मा" का अर्थ केवल गोपन करना नहीँ है वरन् रक्षा करना भी होता है । विद्या की रक्षा शिष्य के हृदय मेँ उसका संचार करने से ही है । वेद की रक्षा उसके ग्रंथों से नहीँ है । 
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पुस्तकालयोँ मेँ अथवा प्रकाशकों के यहाँ रखी पोथियोँ मेँ वेद के मंत्र नहीँ रखे जा सकते । भगवान् श्री शंकरभगत्पादाचार्य कहते है - "मनोवृत्त्युपाधिपरिच्छिन्नं मनोवृत्तिनिष्ठमात्मचैतन्यं" अर्थात् मन की वृत्ति मेँ रहनेवाला एवं उस उपाधि से विशिष्ट आत्मा ही मंत्र शब्द का अर्थ है । पुस्तकस्य मंत्र तो केवल उस वृत्ति का प्रेरक होने से गौणरूप से मंत्र कहा जाता है । ऐसा न मानने पर वेदमंत्रों की नित्यता सिद्ध ही नहीँ हो सकती । अतः शिष्य के मन मेँ ही वेदोँ को लिखने से वेद - रक्षण संभव है । जिस शिष्य से ऐसी आशा नहीँ वह ब्रह्मविद्या का उत्तम अधिकारी भी नहीँ हो सकता ।
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"नर" अर्थात् आत्मा । उससे उत्पन्न जगत भी "नार" कहा जाता है । उसका जो "द्यति" खण्डन या बाध करता है वह "नारद" कहा जाता है । जगत मेँ आत्मा और अनात्मा मिले हुये हैँ । विवेक से उन्हेँ दो टुकडे करके खण्डित किया जाता है । तत्पश्चात् अनात्मा को "द्यायति" तिरस्कृत किया जाता है अतः विवेकी और वैराग्यवान् ही नारद पद वाच्य है । "नार" का अर्थ नरसमुह भी होता है । उनका तिरस्कार अर्थात् नरसमुह से अलग एकान्त मेँ रहने का स्वभाव जिसका है वह नारद है ।
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नारायण । फूल खिलने पर भौँरोँ को निमन्तत्रण नहीँ देना पडता । इसी प्रकार साधक "साधनचतुष्टय" सिद्ध हो जाने पर ज्ञान के साधन स्वयं उपस्थित हो जाते हैँ । साधनचतुष्टय से असम्पन्न साधक मेँ न ब्रह्मविद्या उत्पन्न होगी और न स्थिर । ऐसी एक प्राचीन लोकोक्ति है कि - शेरनी का दूग्ध स्वर्णपात्र मेँ ही दुह कर इकट्ठा किया जा सकता है । वैराग्यहीन प्रथम तो भगवान् श्रीसाम्ब सदाशिव शंकर के स्वरूप को समझ ही नहीँ पायेगा और समझ भी गया तो राग से गिर जायेगा । 
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श्रुतिभगवती स्पष्ट रूप से कहती है - "न प्रवेदयन्ति रागात्" (मुण्डकोपनिषद्) । दुःखानुभव से यद्यपि वितृष्णा उत्पन्न होती है, वैराग्य उत्पन्न नहीँ होता, नारायण । वैराग्य तो विवेक का फल है । और विवेक शब्द का अर्थ ही होता है अलग करना । विकेक के द्वारा राग से अलग होना । विवेक के तलवार के राग को काटना । नर विषयोँ को बाहिर ढुँढ कर वहाँ न पाकर, गेँद(कन्दुक) की दीवाल मेँ ठोकर खाकर वापिस आने की तरह, आत्मत्त्व मेँ जब लौटना है तभी वास्तविक वैराग्य माना जाता है । 
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आज के तथाकथित छद्मवेशी वैरागीयों ने टनों स्वर्ण को रखकर बड़े बड़े ट्रस्ट बना अपने कुटुम्ब परिवारों को ट्रस्ट मेँ रखकर उसकी रखवाली करना अध्यात्म वैराग्य के नाम पर कलंक है । आज बड़ा वैरागी वही है जिनके पास ज्यादा आश्रमों का जाल, गाड़ियो और धन पर जिसका नियन्त्रण है । ऐसे तथाकथित वैरागीयो, भगवावेष, तिलक - मालाधारियों के जालमेँ आकर जो भी धन - सम्पत्ति दान करते वे दानदाता दान की परिभाषा से ईश्वर के न्यालय में निश्चित ही दण्ड के ही भागी बनेँगे । इसमें कोई संदेह नहीं ।
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दुःखानुभव काल मेँ श्मशान वैराग्य उत्पन्न होता है । पर भोग की पूर्णता मेँ जो वितृष्णा है वही उत्तम है । श्मशान वैराग्य दुःखनिवृत होने पर निवृत हो जाता है । माता कुन्ती के पास श्रीकृष्ण महाभारत विजय के पश्चात् अनेको वषों तक नहीँ गये । जब हस्तिनापुर पहुँच कर सभी से मिले तो सभी प्रसन्न थे । केवल माता कुन्ती ने कहा - 
"विपदः सन्तु नः शश्वत्तत्रता जगद्गुरो । 
भवतो दर्शनं यत् स्याद् अपुनर्भवदर्शनम ॥" 
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जब आपके दर्शन मिलते थे वही समय विपत्ति का होने पर भी मुझे प्रिय था । ऐसी विपत्ति बराबर बनी रहे तो अच्छा । धन्य हैँ श्री कुन्ती माँ ! माता श्री कुन्ती जी वैराग्यवती थी अतः दुःखोँ के निवृत होने पर भी श्रीकृष्ण को चाहती थी । अन्य लोग केवल विपत्ति निवृत्यर्थ भगवान् श्रीकृष्ण को चाहते थे । इसी प्रकार सुख हो या दुःख संसार मेँ राग न हो तभी वैराग्य समझना चाहिये । प्रायः लोग दुःख की महिमा बताते हैँ -
"सुख के माथे सिल पडो जो नाम हृदय से जाये ।
बलिहारी वा दुःख की जो पल - पल नाम रटाय ॥"
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पर यह वैराग्य के स्वरूप को न समझने का फल है । दुःख मेँ चाहे नाम रटे पर वह काम्य विषय प्राप्ति के लिये होता है । विषय प्राप्ति के बाद हट जाता है । सुख मेँ भी जो विषय को नहीँ "शिव" को ही काम्य माने वही वैराग्य है । अतः वैराग्य की परीक्षा सुख मेँ है ।
नारायण स्मृतिः

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