गुरुवार, 11 सितंबर 2014

= बेली का अंग ३६(१/३) =

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टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*बेली का अंग ३६*
"सब जग बैठा जीति कर, काहू लिप्त न होइ" - इस सूत्र के व्याख्यान स्वरूप, साक्षीभूत अंग के तदनन्तर अब बेली का अंग निरूपण करते हैं ।
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*मंगलाचरण*
*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।*
*वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥१॥* 
टीका - अब हरि, गुरु संतों को नमो नमस्कार वन्दना करके बेली का स्वरूप प्रतिपादन करते हैं ॥१॥ 
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*दादू अमृत रूपी नाम ले, आत्म तत्वहि पोषै ।*
*सहजैं सहज समाधि में, धरणी जल शोषै ॥२॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! निर्वासनिक निष्काम भाव से आत्म - स्वरूप परमेश्वर का, अभेद निश्चय रूप नाम - स्मरण रूप अमृत, काल से छुड़ाने वाला, अन्तःकरण चतुष्टय की चारों अवस्थाओं(जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरिया) में, आत्माकार वृत्ति की दृढ़ता स्थिति में, आत्म - तत्व की भावना रूप बेली को पोषण करता रहे, और निर्द्वन्द्व सहज समाधि में स्थित होकर धरती रूप शरीर में, नाम - स्मरण रूप जल को पीता रहे ॥२॥ 
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*पसरै तीनों लोक में, लिप्त नहीं धोखे ।*
*सो फल लागै सहज में, सुन्दर सब लोके ॥३॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! ब्रह्म अनुसारिणी वृत्ति रूप बेली, अर्थात् असत्य नाम रूप संसार में सत्य की कल्पना और सत्य में असत्य की कल्पना करके, वृत्ति धोखे में नहीं आवे । उस वृत्ति का प्रवाह, स्थूल - सूक्ष्म - कारण शरीर से आगे बढ़कर, कूटस्थ रूप वृक्ष पर ‘पसरै’ कहिए, स्थिर होवे और फिर पंचकोषमय शरीरों के अध्यास में, वृत्ति को आसक्त न होने देवे, तो फिर इस वृत्ति के जीव ब्रह्म की एकता रूप ज्ञान - फल लगता है । यही फल तीन लोक और चौदह भवन में सबसे उत्तम है ॥३॥
(क्रमशः)

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