शनिवार, 6 सितंबर 2014

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#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
कासौं कहूँ हो अगम हरि बाताँ,
गगन धरणी दिवस नहिं राता ॥टेक॥
संग न साथी, गुरु नहिं चेला, 
आसन पास यों रहै अकेला ॥१॥
वेद न भेद, न करत विचारा, 
अवरण वरण सबन तैं न्यारा ॥२॥ 
प्राण न पिंड, रूप नहिं रेखा, 
सोइ तत्त सार नैन बिन देखा ॥३॥
जोग न भोग, मोह नहिं माया, 
दादू देख काल नहिं काया ॥४॥

- Sant Dadu Dayal 
-English Translation by Pravesh K. Singh 

Whom do I tell about the Inaccessible God, O Brother !
Where neither Sky nor Earth, neither day nor night is there !
There is no friend, no Guru or disciple; no companion is there beside .
Neither Veda, nor thoughts, neither colour or its absence, no distinction of any kind.
Not life, not body, no shape, not even any outline, that Primeval Essence I beheld without eyes.
No Yoga, no enjoyment or suffering, Neither any infatuation nor illusion, I, Dadu, saw Him, beyond any body or even time!]
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टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव इसमें परमेश्वर सम्बन्धी आश्चर्य दिखा रहे हैं कि हे जिज्ञासुओं ! उस अगम मन वाणी का अविषय हरि की भक्ति - ज्ञान रूपी बातें किसको कहें ? उसके स्वरूप में आकाश, धरती, दिन और रात, ये कुछ भी नहीं हैं । वहाँ न कोई संगी साथी है और न चेला और गुरु भाव ही है । वहाँ आशा रूप फाँसी से रहित केवल शुद्ध स्वरूप है । वहाँ वेद का भेद रूप विचार भी नहीं किया जाता । वह वर्ण, काला - गोरा, ब्राह्मण - क्षत्रिय, इन सबसे रहित अवर्ण रूप है । उसमें न प्राण है, न पिंड है । ऐसा रूप, हाथ पर रेखा की भाँति, जीव से दूर नहीं है । वहाँ तत् पद और त्वम् पद का लक्ष्य सार स्वरूप बर्हिमुख नेत्रों के बिना अन्तर्मुख नेत्रों से देखते हैं । वहाँ न योग है, न भोग है, न मोह और माया है । न काया है और न काया का भक्षण करने वाला काल ही है । ऐसे स्वरूप को मुक्तजन अनुभव द्वारा देख रहे हैं ।

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