#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
दादू सबही व्याधि की, औषधि एक विचार ।
समझे तैं सुख पाइये, कोइ कुछ कहो गँवार ॥
सहज विचार सुख में रहै, दादू बड़ा विवेक ।
मन इन्द्रिय पसरै नहीं, अंतर राखै एक ॥
पाणी पावक, पावक पाणी, जाणै नहीं अजाण ।
आदि रु अंत विचार कर, दादू जाण सुजाण ॥
सुख मांहि दुख बहुत हैं, दुख मांही सुख होइ ।
दादू देख विचार कर, आदि अंत फल दोइ ॥
मीठा खारा, खारा मीठा, जाने नहीं गँवार ।
आदि अंत गुण देखकर, दादू किया विचार ॥
कोमल कठिन, कठिन है कोमल, मूरख मर्म न बूझै ।
आदि रु अंत विचार कर, दादू सब कुछ सूझै ॥
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साभार : Rp Tripathi ~
**होम करते हांथ जलना :: और :: मुँह में राम बगल में छुरी :: एक संक्षिप्त वैज्ञानिक परिचर्चा**
卐 सत्यराम सा 卐
दादू सबही व्याधि की, औषधि एक विचार ।
समझे तैं सुख पाइये, कोइ कुछ कहो गँवार ॥
सहज विचार सुख में रहै, दादू बड़ा विवेक ।
मन इन्द्रिय पसरै नहीं, अंतर राखै एक ॥
पाणी पावक, पावक पाणी, जाणै नहीं अजाण ।
आदि रु अंत विचार कर, दादू जाण सुजाण ॥
सुख मांहि दुख बहुत हैं, दुख मांही सुख होइ ।
दादू देख विचार कर, आदि अंत फल दोइ ॥
मीठा खारा, खारा मीठा, जाने नहीं गँवार ।
आदि अंत गुण देखकर, दादू किया विचार ॥
कोमल कठिन, कठिन है कोमल, मूरख मर्म न बूझै ।
आदि रु अंत विचार कर, दादू सब कुछ सूझै ॥
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साभार : Rp Tripathi ~
**होम करते हांथ जलना :: और :: मुँह में राम बगल में छुरी :: एक संक्षिप्त वैज्ञानिक परिचर्चा**
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कुछ भाग्यशाली लोगों को छोड़कर, हम में से अधिकांश के जीवन में, कभी ना कभी ऐसे पल आ ही जाते हैं, जब हम, हताशा/निराशा के क्षणों में, यह कहने पर मजबूर हो जाते हैं कि --
भाई ये तो कलियुग है, यहाँ तो होम करते भी हांथ जलते हैं, अर्थात, अच्छा करते भी बुरा होता है .. और .. किसी का भरोसा करना भी कठिन है, यहाँ तक की ईश्वर भक्ति करते लोगों का भी, क्योंकि, माँ सीता के हरण में भी रावण ने, सन्यासी का ही भेष बनाया था, या, हनुमान जी को ठगने के लिए भी, कालनेमि ने, साधु/गुरु का ही भेष बनाया था अर्थात, मुँह में राम बगल में छुरी, को चरितार्थ करने वाले लोग भी हो सकते हैं ..? अतः सावधान रहो ..!! आइए आज के इस आलेख में, हम इन कथनों की, सत्यता पर संक्षिप्त परिचर्चा करें ...!!
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कुछ भाग्यशाली लोगों को छोड़कर, हम में से अधिकांश के जीवन में, कभी ना कभी ऐसे पल आ ही जाते हैं, जब हम, हताशा/निराशा के क्षणों में, यह कहने पर मजबूर हो जाते हैं कि --
भाई ये तो कलियुग है, यहाँ तो होम करते भी हांथ जलते हैं, अर्थात, अच्छा करते भी बुरा होता है .. और .. किसी का भरोसा करना भी कठिन है, यहाँ तक की ईश्वर भक्ति करते लोगों का भी, क्योंकि, माँ सीता के हरण में भी रावण ने, सन्यासी का ही भेष बनाया था, या, हनुमान जी को ठगने के लिए भी, कालनेमि ने, साधु/गुरु का ही भेष बनाया था अर्थात, मुँह में राम बगल में छुरी, को चरितार्थ करने वाले लोग भी हो सकते हैं ..? अतः सावधान रहो ..!! आइए आज के इस आलेख में, हम इन कथनों की, सत्यता पर संक्षिप्त परिचर्चा करें ...!!
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हम सब, इस सत्य से भली-भांति परिचित हैं कि ---
अनादि कल से, प्रकृति, इस शाश्वत नियम .. "जैंसा बीज, वैंसा फल".. का ही अनुसरण कर रही है, अतः इससे तो यही संदेश मिलता है कि --- कोऊ ना कोऊ सुख-दुःख कर ताता, निज़-कृत कर्म भोग सुनु भ्राता ..या.. कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करिय सो तस फल चाखा ....!!
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अनादि कल से, प्रकृति, इस शाश्वत नियम .. "जैंसा बीज, वैंसा फल".. का ही अनुसरण कर रही है, अतः इससे तो यही संदेश मिलता है कि --- कोऊ ना कोऊ सुख-दुःख कर ताता, निज़-कृत कर्म भोग सुनु भ्राता ..या.. कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करिय सो तस फल चाखा ....!!
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अर्थात--
हे भाई, इस संसार में, हमें सुख और दुःख देने वाला कोई अन्य नहीं है, सब हमारे कर्मों का ही हिसाब-किताब है ..या .. अर्थात, संसार में कर्म की प्रधानता है, जो जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल पाता है ..!! सार रुप में--
यदि हम किसान की तरह, बीज बोते समय, सावधानी रखें, तो हमें बाद में, पैदावार काटते समय, परेशानियों से नहीं गुजरना पड़ेगा ..? क्योंकि, जैसा बीजा-रोपण, वैंसी ही पैदावार ..!!
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हे भाई, इस संसार में, हमें सुख और दुःख देने वाला कोई अन्य नहीं है, सब हमारे कर्मों का ही हिसाब-किताब है ..या .. अर्थात, संसार में कर्म की प्रधानता है, जो जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल पाता है ..!! सार रुप में--
यदि हम किसान की तरह, बीज बोते समय, सावधानी रखें, तो हमें बाद में, पैदावार काटते समय, परेशानियों से नहीं गुजरना पड़ेगा ..? क्योंकि, जैसा बीजा-रोपण, वैंसी ही पैदावार ..!!
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अन्तर सिर्फ़ समय का है --
अर्थात बीजारोपन और फल लगने की बीच की, समयावधि का ..!! प्रकृति में सभी कुछ अपनी एक निश्चित अवधि से होता है, अर्थात-- धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सीचे सौ घड़ा, जब रितु तब फल होय ..., चरितार्थ होता है ...!! उदाह्नार्थ -- मनुस्य के बच्चे के अंग भी गर्भ में, नौ माह में परिपक्व होते हैं, और 25 वर्ष में, जवानी को प्राप्त करते हैं ..!! अर्थात, एक निश्चित समयावधि पर, प्रकृति फल देती है, और बीज के अनुसार भी, बीजारोपन और फल-प्राप्ति का कालांतर, परिवर्तित होता रहता है ..!!
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अर्थात बीजारोपन और फल लगने की बीच की, समयावधि का ..!! प्रकृति में सभी कुछ अपनी एक निश्चित अवधि से होता है, अर्थात-- धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सीचे सौ घड़ा, जब रितु तब फल होय ..., चरितार्थ होता है ...!! उदाह्नार्थ -- मनुस्य के बच्चे के अंग भी गर्भ में, नौ माह में परिपक्व होते हैं, और 25 वर्ष में, जवानी को प्राप्त करते हैं ..!! अर्थात, एक निश्चित समयावधि पर, प्रकृति फल देती है, और बीज के अनुसार भी, बीजारोपन और फल-प्राप्ति का कालांतर, परिवर्तित होता रहता है ..!!
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अतः, प्रकृति के उपरोक्त नियम अनुसार,
किसी अन्य को, दोष देना उचित नहीं है ..!! तो, अब हमारे सामने प्रश्न यह उपस्थित हो जाता है कि -- हम स्वयं भी क्यों गलती करते हैं ..? और क्या कोई तरीका है, जिससे इन गलतियों से हम, अपना बचाव कर सकें ..?
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किसी अन्य को, दोष देना उचित नहीं है ..!! तो, अब हमारे सामने प्रश्न यह उपस्थित हो जाता है कि -- हम स्वयं भी क्यों गलती करते हैं ..? और क्या कोई तरीका है, जिससे इन गलतियों से हम, अपना बचाव कर सकें ..?
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प्रथम-- हम गलती क्यों करते हैं ..?
इसका सिर्फ़ एक ही कारण प्रतीत होता है, मनुष्य के रुप में, हमारे द्वारा, ईस्वर-प्रदत्त-शक्ति का, दुरुपयोग ..!!
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इसका सिर्फ़ एक ही कारण प्रतीत होता है, मनुष्य के रुप में, हमारे द्वारा, ईस्वर-प्रदत्त-शक्ति का, दुरुपयोग ..!!
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ईस्वर-प्रदत्त-शक्ति :---
मनुस्य के रुप में जन्म लेते ही,
परम्-पिता परमेस्वर हमें प्रकृति से सिर्फ़, प्राण-वायु या जल, भोजन, वस्त्र आदि ही नहीं दिलाता वरन् .. "स्वतंत्र-इच्छा-शक्ति के रुप में" .. एक "अनुपम-मानसिक-शक्ति", भी प्रदान करता है, जो सिर्फ़ उसने, मनुश्य को ही प्रदान की है, अन्य किसी प्राणी को नहीं ..!!
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मनुस्य के रुप में जन्म लेते ही,
परम्-पिता परमेस्वर हमें प्रकृति से सिर्फ़, प्राण-वायु या जल, भोजन, वस्त्र आदि ही नहीं दिलाता वरन् .. "स्वतंत्र-इच्छा-शक्ति के रुप में" .. एक "अनुपम-मानसिक-शक्ति", भी प्रदान करता है, जो सिर्फ़ उसने, मनुश्य को ही प्रदान की है, अन्य किसी प्राणी को नहीं ..!!
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उदाहरणार्थ -- शेर यदि, हरी हरी दूब के जंगल में भी हो, परन्तु यदि मांस ना हो तो वह् भूंख से तड़फ तड़फ कर जान दे देगा, परन्तु घांस खाकर अपनी जान नहीं बचायेगा .. या.. गाय यदि असंख्य जानवरों के बीच भी हो, परन्तु घांस ना हो तो, वह् भी तड़फ तड़फ कर जान दे देगी, परन्तु किसी जानवर को मार कर नहीं खायेगी ..!! परन्तु, मनुश्य ...?
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अतः, ईस्वर ने मनुश्य के लिए, उसके द्वारा रचित इस संसार में, सुचारु-रुप से जीवन-प्र्वंधन के लिए, एक विशेष अचार-संहिता बनाई, जिसे उसने .. वैदिक-चर्या-विज्ञान, .. या .. सनातन-धर्म .. का नाम दिया .., जो विश्व के प्रत्येक मनुष्य के लिए, विज्ञान के समान, समान रुप से, लाभकारी है ..!!
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परन्तु, मनुष्यों ने, अपनी स्वतंत्र-इच्छा-शक्ति का दुरुपयोग कर, आचार संहिता तो क्या, आचार-संहिता बनाने वाले को ही मानना बंद कर दिया, और कालांतर में, अपनी अलग अलग आचार-संहिताये बना, और उन्हें, पृथक-पृथक धर्मों का नाम दे, अपने को ही,स्वयं-भू , परम्-पिता परमेस्वर का दर्जा दिलाना, शुरू कर दिया, जबकि वास्तविकता में -- उन में से, किसी में भी सामर्थ नहीं है, उस प्रभु की कृपा के वगैर, अपने लिए भी, एक स्वांश लेने की ..!!
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द्वितीय :-- गलती कैंसे सुधारें ..?
गलती सुधारने का, एक ही तरीका है, सत्यावलोकन की, और सत्य के अनुसार जीवन-प्र्वंधन की ..!! और वह् भी, वगैर बिलम्ब के, क्योंकि, काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में परलय होयगी, बहुरि करेगा कब ..? और प्रकृति में तो, बैंक की तरह, मनुस्य निर्मित, जमा रुपयों के जोड़-घटाने का नियम भी लागू नहीं होता ..!!
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द्वितीय :-- गलती कैंसे सुधारें ..?
गलती सुधारने का, एक ही तरीका है, सत्यावलोकन की, और सत्य के अनुसार जीवन-प्र्वंधन की ..!! और वह् भी, वगैर बिलम्ब के, क्योंकि, काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में परलय होयगी, बहुरि करेगा कब ..? और प्रकृति में तो, बैंक की तरह, मनुस्य निर्मित, जमा रुपयों के जोड़-घटाने का नियम भी लागू नहीं होता ..!!
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यहाँ तो जैसे किसान ने, यदि दस बीज आम, और एक बीज बबूल, का बोया है तो, दोनों ही अपनी अपनी समयावधि से, पैदा होंगे ..!! पुन्य से, राम जैसा पुत्र भी प्राप्त किया हो सकता है, परन्तु, पाप-कार्य से(निर-अपराध श्रवण कुमार के बध से), उसी राम के वियोग में, तड़फ तड़फ कर, जान भी देनी पड़ती है ..(राम राम कहि, राम कहि, राम राम कहि राम; तनु परिहरि रघुवर विरह, राऊ सुर-धाम) ..!!
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अतः, जरूरत है, प्रति-पल सावधान होकर बीजा-रोपण करने की -- क्योंकि, सावधानी हटी, और दुर्घटना घटी ..!! ..!! परन्तु, जैसे यदि एक कुए में, गिरने वाली रस्सी का अन्तिम छोड़ भी पकड़ में आ जाए तो उसी के सहारे, कुये से संपूर्ण रस्सी, बाल्टी में पानी सहित, बापिस प्राप्त की जा सकती है, अतः --जब जागो तब सवेरा .. को चरितार्थ कर, जीवन को कभी भी, "आत्म-ज्ञान"(वैदिक-चर्या विज्ञान) के सहारे, आनंद-मय, बनाया जा सकता है ..!!
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अतः, जरूरत है, प्रति-पल सावधान होकर बीजा-रोपण करने की -- क्योंकि, सावधानी हटी, और दुर्घटना घटी ..!! ..!! परन्तु, जैसे यदि एक कुए में, गिरने वाली रस्सी का अन्तिम छोड़ भी पकड़ में आ जाए तो उसी के सहारे, कुये से संपूर्ण रस्सी, बाल्टी में पानी सहित, बापिस प्राप्त की जा सकती है, अतः --जब जागो तब सवेरा .. को चरितार्थ कर, जीवन को कभी भी, "आत्म-ज्ञान"(वैदिक-चर्या विज्ञान) के सहारे, आनंद-मय, बनाया जा सकता है ..!!
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**ॐ कृष्णम वंदे जगत् गुरुम**
**ॐ कृष्णम वंदे जगत् गुरुम**

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