रविवार, 7 सितंबर 2014

= साक्षीभूत का अँग ३५(१०-१२) =

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टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*साक्षीभूत का अंग ३५*
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*बुरा भला सिर जीव के, होवै इस ही मांहि ।*
*दादू कर्ता कर रह्या, सो सिर दीजै नांहि ॥१०॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! इस शरीर के भीतर, चिदाभास युक्त अन्तःकरण में ही, शुभ – अशुभ, पाप - पुण्य उत्पन्न होते हैं । उनके अनुसार ही सृष्टिकर्ता ईश्वर फल देता है ॥११॥ 
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*साधु साक्षीभूत*
*कर्ता ह्वै कर कुछ करै, उस मांहि बँधावै ।*
*दादू उसको पूछिये, उत्तर नहीं आवै ॥११॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! यदि ‘कर्ता’ कहिए सबका कारण चैतन्य ही, आप सब शुभ - अशुभ करके, स्वयं चैतन्य रूप जीव, उस कर्ता रूप अहंकार में बँध जावे, तो कैसे ठीक है ? क्योंकि कर्ता तो सब शुभ - अशुभ कर्म रूप बन्धनों से अलग रहता है ॥१२॥ 
कुंड खणायो खोद कर, जती घाट नहीं कीन्ह । 
गाय मरी बावस कहीं, हत्या मम क्यूं दीन्ह ॥ 
दृष्टान्त - एक नगर में जती जी बहुत पैसे वाले थे । उसी नगर में एक वेदान्ती संत भी आकर प्रवचन करने लगे । सभी लोग प्रवचन में जाते । एक रोज जती जी भी गये । जती जी को प्रवचन अच्छे लगे, फिर तो रोज ही जाने लगे । महात्मा जी को किसी ने कहा कि जती जी बहुत पैसे वाले हैं । महात्मा बोले - जती जी आपके पास पैसा है, इसका आप क्या करोगे ? कुछ जन - समुदाय की सेवा में खर्च कर दो । जती जी बोले - कहाँ लगाऊं ? महात्मा बोले - अमुक स्थान पर एक जलाशय कुण्ड बना दो । 
जती जी ने खूब पैसा लगाकर प्रेम से कुण्ड बनवा दिया, परन्तु उसके गऊ - घाट नहीं रखा । ग्रीष्म काल में एक गऊ प्यास से घबराई हुई कुण्ड के चारों तरफ घूमने लगी । जब रास्ता न मिला तो पानी देखकर, पानी पीने को सीढ़ियों से उतरती समय गिर गई और खत्म हो गई । वह गौ हत्या जतीजी के पास आई और बोली - आप मुझको धारण करो । जती जी बोले - तुम पानी के लिये गिरी हो, इन्द्र के पास जाओ, इन्द्र भोगेगा, इन्द्र ने पानी बरसाया है । जब इन्द्र के पास गई, इन्द्र बोले - चलो तुम कुण्ड पर, मैं आता हूँ । 
सायंकाल जती जी कुण्ड पर रोज जाया करते थे और कुण्ड को देखकर मन में राजी होते और सोचते कि मैंने कितना पैसा लगाया है । मेरे जैसा कुण्ड कौन बनाएगा ? जती कुण्ड पर बैठे थे । इन्द्र मनुष्य रूप में आये और कुण्ड के चारों मेर घूमने लगे और बोले - धन्य हो ! किस महात्मा ने इतना पैसा लगाकर यह कुण्ड बनाया है ? उसको तो स्वर्ग की प्राप्ति होगी ? 
पुनः पुनः कहने लगे । तब जती जी बोले - अरे ! मैंने पैसा लगाया है और किसने लगाया है ? अभी तो मैं जिन्दा बैठा हूँ । इन्द्र बोले - यह गौ हत्या मेरे पास क्यों भेजी ? आप तो कर्ता हो रहे हो, तो गऊ - घाट क्यों नहीं बनाया ? जती जी चुप हो गये और गौ हत्या का पाप भोगना पड़ा । जब जीव कर्ता होकर कर्म करता है तो, उसके फल को भी भोगता है ।
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*दादू केई उतारैं आरती, केई सेवा कर जांहि ।* 
*केई आइ पूजा करैं, केई खिलावें खांहि ॥१२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! कई सांसारिक जीव सकाम - कर्मी मन्दिरों में जाकर आरती उतारते हैं और कई जाकर सकाम सेवा करते हैं । कई वासनाओं को लेकर पूजा करते हैं । कई फल इच्छा से संतों को भोजन कराके, आप खाते हैं । परन्तु यह दिखावटी और सकाम सेवा - पूजा आदि, विशेष फल देने वाले नहीं हैं ॥१३॥
(क्रमशः)

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