गुरुवार, 18 सितंबर 2014

*सीकरी प्रसंग २८ वां दिन*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*सीकरी प्रसंग २८ वां दिन ~*
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२८ वें दिन अकबर ने कहा - भगवन् ! नवधा भक्ति तो मेरे समझ में आ गई है, सब आज आप प्रेमा और पराभक्ति बतावें ? तब दादूजी ने कहा - सबसे ममता हटाकर राम में ही प्रेम करने से प्रेमाभक्ति होती है । उस अनन्यता का नाम ही प्रेमाभक्ति है -
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*प्रेम भक्ति जब ऊपजे, निश्चल सहज समाधि ।*
*दादू पीवे रामरस, सतगुरु के प्रसाद ॥९॥*
(उपजन अंग २८)
इश्क मुहब्बत मस्त मन, तालिबदर दीदार ।
दोस्त दिल हरदम हजूर, यादगार हुशियार ॥६४॥
(विरह अंग ३)
वे खुद खबर होशियार बाशद, खुद खबर पामाल ।
वे कीमत मस्तान गलतान, नूरप्याले ख्याल ॥३१२॥
(परि. अं ४)
इत्यादि साखियां सुनाकर फिर ४५ का पद -
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५८. रस त्रिताल
राम रस मीठा रे, कोई पीवै साधु सुजाण ।
सदा रस पीवै प्रेम सौं, सो अविनाशी प्राण ॥टेक॥
इहि रस मुनि लागे सबै, ब्रह्मा विष्णु महेश ।
सुर नर साधू संतजन, सो रस पीवै शेष ॥१॥
सिध साधक योगी जती, सती सबै शुकदेव ।
पीवत अंत न आवही, ऐसा अलख अभेव ॥२॥
इहि रस राते नामदेव, पीपा अरु रैदास ।
पीवत कबीरा ना थक्या, अजहूँ प्रेम पियास ॥३॥
यहु रस मीठा जिन पिया, सो रस ही मांहि समाइ ।
मीठे मीठा मिल रह्या, दादू अनत न जाइ ॥४॥
यह पद कहा ।
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फिर कहा - हे अकबर अब तुम पराभक्ति भी सुनो -
टगा टगी जीवन मरण, ब्रह्म बराबर होय ।
परकट खेले पीव से, दादू विरला कोय ॥३१०॥
(परि. अंग ४)
४०७. पराभक्ति । त्रिताल
राम तूँ मोरा हौं तोरा, पाइन परत निहोरा ॥टेक॥
एकै संगैं वासा, तुम ठाकुर हम दासा ॥१॥
तन मन तुम कौं देबा, तेज पुंज हम लेबा ॥२॥
रस माँही रस होइबा, ज्योति स्वरूपी जोइबा ॥३॥
ब्रह्म जीव का मेला, दादू नूर अकेला ॥४॥
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द्वितीय पद २८८. परिचय पराभक्ति । कोकिल ताल
अखिल भाव अखिल भक्ति, अखिल नाम देवा ।
अखिल प्रेम अखिल प्रीति,अखिल सुरति सेवा ॥टेक॥
अखिल अंग अखिल संग, अखिल रंग रामा ।
अखिला रत अखिला मत, अखिला निज नामा ॥१॥
अखिल ज्ञान अखिल ध्यान, अखिल आनन्द कीजे ।
अखिला लय अखिला में, अखिला रस पीजे ॥२॥
अखिल मगन अखिल मुदित, अखिल गलित सांई ।
अखिल दर्श अखिल पर्श, दादू तुम मांहीं ॥३॥
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तृतीय पद २१० - परिचय पराभक्ति । राज विद्याधर ताल
जोगी जान जान जन जीवै ।
बिन ही मनसा मन हि विचारै, बिन रसना रस पीवै ॥टेक॥
बिनहीं लोचन निरख नैन बिन, श्रवण रहित सुन सोई ।
ऐसै आतम रहै एक रस, तो दूसर नाम न होई ॥१॥
बिन ही मार्ग चलै चरण बिन, निहचल बैठा जाई ।
बिन ही काया मिलै परस्पर, ज्यों जल जलहि समाई ॥२॥
बिन ही ठाहर आसण पूरे, बिन कर बैन बजावै ।
बिन ही पावों नाचै निशिदिन, बिन जिभ्या गुण गावै ॥३॥
सब गुण रहिता सकल बियापी, बिन इंद्री रस भोगी ।
दादू ऐसा गुरु हमारा, आप निरंजन जोगी ॥४॥
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चतुर्थ पद २११ - रूपक ताल
इहै परम गरु योगं, अमी महारस भोगं ॥टेक॥
मन पवना स्थिर साधं,
अविगत नाथ अराधं, तहँ शब्द अनाहद नादं ॥१॥
पंच सखी परमोधं,
अगम ज्ञान गुरु बोधं, तहँ नाथ निरंजन शोधं ॥२॥
सद्गुरु मांहि बतावा,
निराधार घर छावा, तहँ ज्योति स्वरूपी पावा ॥३॥
सहजैं सदा प्रकाशं,
पूरण ब्रह्म विलासं, तहँ सेवग दादू दासं ॥४॥
उक्त साखी और पदों से पराभक्ति को समझाया । तब अकबर आदि श्रोताओं ने दादूजी को धन्यवाद देते हुये प्रणाम किया ।

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