गुरुवार, 18 सितंबर 2014

१०. दुष्ट को अंग ~ २

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*१०. दुष्ट को अंग*
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*= इन्दव छन्द =* 
*घात अनेक रहैं उर अंतरि,* 
*दुष्ट कहै सुख सौं अति मीठी ।* 
*लोटत पोटत व्याघ्र ही ज्यौं नित,* 
*ताकत है पुनि की पीठी ॥* 
*ऊपर तैं छिरकै जल आंनि सु,* 
*हेठ लगावत जारि अंगीठी ।* 
*या मांहि कूर कछू मति जानहुं,* 
*सुन्दर आपुनि आंखिनी दीठी ॥२॥* 
*दुष्ट की अनुपम क्रूरता* : यह दुष्ट दूसरे के लिये हानि(घात) करने का विचार अपने मन में छिपाये रहता है, परन्तु उसके सामने उसकी प्रशंसा में लगा रहता है । 
वह उसके सामने उस की अनुशंसा(खुशामद) में लौट पोट होता रहता है परन्तु वह उसकी हत्या के लिये व्याघ्र की तरह पीठ को लक्ष्य बनाये रखता है । 
ऊपर से वह जल छिड़कर अग्नि बुझाने का अभिनय करता है, परन्तु नीचे नीचे अंगीठी के सहारे अग्नि जलाये रखता है । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं – इस दुष्ट की क्रूरता में कोई कमी नहीं है, यह सब हमने अपनी आँखों से प्रत्यक्ष देख रखा है ॥२॥
(क्रमशः) 

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