॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*१०. दुष्ट को अंग*
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*= इन्दव छन्द =*
*घात अनेक रहैं उर अंतरि,*
*दुष्ट कहै सुख सौं अति मीठी ।*
*लोटत पोटत व्याघ्र ही ज्यौं नित,*
*ताकत है पुनि की पीठी ॥*
*ऊपर तैं छिरकै जल आंनि सु,*
*हेठ लगावत जारि अंगीठी ।*
*या मांहि कूर कछू मति जानहुं,*
*सुन्दर आपुनि आंखिनी दीठी ॥२॥*
*दुष्ट की अनुपम क्रूरता* : यह दुष्ट दूसरे के लिये हानि(घात) करने का विचार अपने मन में छिपाये रहता है, परन्तु उसके सामने उसकी प्रशंसा में लगा रहता है ।
वह उसके सामने उस की अनुशंसा(खुशामद) में लौट पोट होता रहता है परन्तु वह उसकी हत्या के लिये व्याघ्र की तरह पीठ को लक्ष्य बनाये रखता है ।
ऊपर से वह जल छिड़कर अग्नि बुझाने का अभिनय करता है, परन्तु नीचे नीचे अंगीठी के सहारे अग्नि जलाये रखता है ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं – इस दुष्ट की क्रूरता में कोई कमी नहीं है, यह सब हमने अपनी आँखों से प्रत्यक्ष देख रखा है ॥२॥
(क्रमशः)

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