गुरुवार, 18 सितंबर 2014

= एक विं. त. ७/८ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“एकविंशति तरंग” ७/८)*
*छप्पय -* 
तेज तापस संत मूरति, 
भानु सम शुभदर्शनम् । 
दीनवत्सल चंद शीतल, 
कृपा द्रष्टि सुहर्षनम् ॥ 
चरण परसत चित्त हरषत, 
दोष कलिमल मर्दनम् । 
दास नारायण है समर्पित, 
करत गुरुपद वन्दनम् ॥७॥ 
हे तपस्वी संत ! आपकी मूर्ति भानुसमान तेजस्वी है, आपके दर्शन से विचार शुद्ध होते हैं । आपकी कृपा दृष्टि चन्द्रमा के समान शीतल है । हे दीनवत्सल ! आपको देखकर परम हर्ष का अनुभव हो रहा है । आपके चरण कमलों का स्पर्श करने मात्र से कलियुग के मल दोष दूर हो जाते हैं, चित्त हर्षित हो जाता है । यह नारायण, दासतुल्य समर्पित भावना से गुरुदेव के पादपद्मों की वन्दना करता है ॥७॥ 
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*राजा ने श्री दादूजी की प्रार्थना की -* 
श्‍वेत अम्बर एक रूप धर, 
भाल शोभित चन्दनम् । 
कृष्ण दण्ड कमण्डलु पय, 
सुधा सम सुख कन्दनम् ॥ 
एक व्यापक सत निरंजन, 
ब्रह्म ध्यावत निर्गुणम् । 
दास नारायण है सुसेवत, 
पादुका - पद पावनम् ॥८॥ 
आपने शरीर पर एक श्‍वेत अम्बर ही धारण कर रखा है, भाल पर चन्दन सुशोभित है । कृष्ण दण्ड को धारण करने वाले हे संत ! आपके कमण्डलु का जल सुधासम सुखदायक है । आप निरन्तर व्यापक निरंजन, सत्य परब्रह्म का ही ध्यान लगाते रहते हैं । यह नारायण, दासतुल्य आपकी चरण - पादुकाओं का सेवक है ॥८॥ 
(क्रमशः)

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