मंगलवार, 2 सितंबर 2014

७. विश्वास का अंग ~ ५

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*७. विश्वास का अंग* 
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*काहे कौं दौरत है दशहूं दिश,*
*तूं नर देखि कियौ हरि जू कौ ।* 
*बैठ रहै दूरिकैं मुख मूंदि,* 
*उघारीकैं दांत खवाइ है टूकौ ॥* 
*गर्भ थकै प्रतिपाल करी जब,* 
*हो रह्यौ तब तूं जड मूकौ ।* 
*सुन्दर क्यौं बिललात फिरै अब,* 
*राखि हृदै बिसवास प्रभू कौ ॥५॥* 
*भोजन के लिए भगवान् पर विश्वास रख* : अरे मानव ! तूँ क्यों व्यर्थ ही चारों ओर दौड़ता फिर रहा है । अरे ! तूँ सिरजनहार का चमत्कार तो देख कि - 
तूँ कहीं भी छिप कर बैठा रहेगा, फिर भी वह वहाँ पहुँच कर तेरे दाँत खोल कर तुझे भोजन करा ही देगा । 
क्या तुझे यह ज्ञात नहीं कि जब तू गर्भाशय में गूँगे और अचेतन और समान पड़ा था तभी से वह तेरी रक्षा में सर्वथा सावधान है । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते पूछ्ते हैं – तब तूँ क्यों इधर उधर विलखता फिर रहा है । क्यों नहीं तू अपने सिरजनहार प्रभु का विश्वास कर उस का ही अपने हृदय में ध्यान रखता है ! ॥५॥
(क्रमशः)

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