गुरुवार, 11 सितंबर 2014

७. विश्वास का अंग ~ १४

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*७. विश्वास का अंग* 
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*जगत मैं आइ तैं बीसार्यौ है जगतपति,*
*जगत कियौ है सोई जगत भरतु है ।* 
*तेरै चिंता निश दिन और ई परी है आइ,* 
*उद्यम अनेक भांति भांति के करतु है ॥* 
*इत उत जाइ कैं कमाइ करि ल्याऊं कछु,* 
*नैकु न अज्ञानी नर धीरज धरतु है ।* 
*सुन्दर कहत एक प्रभु के विश्वास बिन,* 
*बादि कै वृथा ही शठ पचि कै मरतु है ॥१४॥* 
॥ इति विश्वास को अंग ॥७॥ 
तूँ इस जगत् में आकर उस जगत्पति को भूल गया, जिसने इस जगत् को रचा और जो अब इसका पालन पोषण कर रहा है । 
तूँ रात दिन अन्य चिनताओं में ही व्यस्त रहता है, तथा उन की पूर्ति हेतु नाना प्रकार के उध्योग करता रहता है । 
रे अज्ञानी ! इधर उधर जा कर तूँ कुछ वित्तोपार्जन कर लाता है तो उससे तेरी तृष्णा बढ़ती जाती है; परन्तु तुझ में धैर्य नहीं है ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - एक उस जगन्नियन्ता प्रभु पर विश्वास किये बिना तूँ वृथा प्रयासों में पच पचकर मर रहा है ! ॥१४॥ 
॥ विश्वास का अंग सम्पन्न ॥
(क्रमशः)

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