गुरुवार, 11 सितंबर 2014

= विं. त. ३०/३१ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“विंशति तरंग” ३०/३१)*
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*करडाला में मोरड़ा ~* 
बूझत संत हजूर रमे कित, 
संत कहें गुरु हैं करडाले । 
यों सुनि सेवक होत विदा तब, 
संत सभी पुनि मोरड़े चाले ॥ 
दूसर संत मिले तिन ठाहर, 
बूझत फेर चले मतवाले । 
ताहिं मिले गुरु मोरड़े ग्रामहिं, 
आप दया करि शिष्य संभाले ॥३०॥ 
वहां भी गुरुदेव के दर्शन नहीं हो सके, क्योंकि श्री दादूजी तो मोरड़ा - ग्राम पधार चुके थे । संतों से पूछता हुआ चतुर्भुज मोरड़ा आ गया । वहाँ गुरुदेव के चिर प्रतीक्षित दर्शन पाकर गद्गद हो गया । गुरुदेव ने भी उसकी श्रद्धाभक्ति देखकर उसे अपनी शरण में ले लिया । वह भक्त श्रद्धावनत होकर स्तुति करने लगा ॥३०॥ 
*छप्पय : चतुर्भुज को उपदेश व ज्ञान मार्ग ~* 
चरण कोमल अरुण पंकज, 
दादु गुरु हो गुणनिधे ! 
मोरड़े पग धरत स्वामी, 
दास दर्शन यों विधे ॥ 
आप भाखत - पंथ चालत, 
चतुर्भुज ! तप हो सुधे । 
नाम जपत करत करुणा, 
प्रीति गुरु सों यो बधे ॥३१॥ 
हे गुरुदेव ! आप गुणों के निधि हैं, आपके चरण कमल के समान कोमल और अरूण है । मैं आपके दर्शनों के लिये इधर उधर भटकता रहा, किन्तु आप तो मोरड़़ा ग्राम में विराज रहे थे । तब गुरुदेव ने फरमाया हे चतुर्भुज ! गुरुदर्शन के लिये इतने दिनों पदयात्रा करते रहे, यह तो सहजरूप से तपस्या हुई । पद - पद पर एक - एक पाप क्षीण होता गया, और अब तुम तन - मन से शुद्ध हो गये हो । प्रतिक्षण करुणा से नाम जपते हुये तुम्हारा अन्त:करण निर्मल हो गया है । इससे तुम्हारी भक्ति और प्रीति में वृद्धि हुई है ॥३१॥ 
(क्रमशः)

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