मंगलवार, 30 सितंबर 2014

११. मन को अंग ~ ९

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*११. मन को अंग*
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*केतक ध्यौंस भये समुझावत,*
*नैकु न मानत है मन भौंदू ।* 
*भूली रह्यौ विषिया सुख में,*
*कछु और न जांनत है शठ दौंदू ॥* 
*आंखि न कांन न नाक बिना सिर,*
*हाथ न पांव नहीं मुख पौंदू ।* 
*सुन्दर ताहि गहै कोऊ क्यौं करि,*
*निकसि जाइ बड़ौ मन लौंदू ॥९॥* 
इस मन को हम कितने दिनों से समझाते चले आ रहे हैं, परन्तु यह मूर्ख मन हमारी शिक्षा को कुछ भी कान पर नहीं धरता । 
यह विषयसुख में इतना आसक्त हो गया है की यह काम के अतिरिक्त किसी अन्य तत्व को दोदा कौवे के तुल्य अपने लिये उपयोगी समझता ही नहीं है । 
इसकी आँख, कान, नासिका, सिर, हाथ, पाँव, मुख एवं पीठ आदि अंगों में से कोई भी अंग नयनाभिराम नहीं हैं । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - यह मिटटी के लौंदे(पिण्ड) के समान आकृति वाला मन इस शरीर से निकल कर जब चाहे तब बाहर संसार में दौड़ लगाने लगता है, इसे कोई कैसे निगृहित करे ! ॥९॥ 
(क्रमशः)

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