रविवार, 7 सितंबर 2014

७. विश्वास का अंग ~ १०

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*७. विश्वास का अंग* 
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*काहे कौं फिरत नर दीन भयौ घर घर,*
*देखियत तेरौ तौ अहार एक सेर है ।* 
*जाकौ देह सागर मैं सुन्यौ सत जोजन कौ,* 
*ताहू कौं तौ देत प्रभु या मैं नहि फेर है ॥* 
*भूखौ कोउ रहत न जानिये जगत मांहि,* 
*कीरी अरु कुंजर सबनि ही कौ दे रहै ।* 
*सुन्दर कहत तूं बेसास क्यों न राखै शठ,* 
*बार बार समुझाइ कह्यौ केती बेर है ॥१०॥* 
*भोजन के लिये भगवान् पर विश्वास रख* : अरे मानव ! तूँ क्यों यह दीनता धारण कर घर घर, द्वार द्वार भटकता फिर रहा है । अरे ! तुझे प्रतिदिन क्या और कितना चाहिये ? केवल एक सेर अन्न । 
तो तूँ इस प्रसंग में यही सोच कर शान्त रह कि समुद्र में रहने वाले जिस प्राणी की सौ योजन लम्बी देह है उसके लिये भी भगवान् भोजन की व्यवस्था करते हैं । इस में सन्देह की कहीं से भी सम्भावना(= फेर) नहीं है ।
इस जगत् में कीड़ी से हाथी तक कहीं भी कोई रात्रि को भूखा नहीं सोता । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं – इसलिये अरे मूर्ख ! तूँ भी विश्वास रख, मैंने तुझ को कितनी बार, अनेक तरह से, नहीं समझाया है क्या ! ॥१०॥
(क्रमशः)

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