रविवार, 7 सितंबर 2014

#daduji 

सीकरी प्रसंग २२ वा दिन  ~

२२ वें दिन अकबर ने पू़छा- भगवन्! आपने गत दिन के प्रवचन में कहा था- देह को यत्न द्वारा स्थिर रखते हैं किन्तु मन स्थिर नहीं रहता सो आसन मारकर मौन धारण करके बैठ जाने पर मन स्थिर हो ही जायगा क्यों न होगा ? 
दादूजी ने कहा-
काया राखे बंद दे, मन दह दिशि खेले ।
दादू कनक रु कामिनी, माया नहिं मेले ॥ 
मन से मीठी मुख से खारी, 
माया त्यागी कहै बाजारी ॥ ७६ ॥
अकबर- जो माया त्याग कर देते है, उनका तो हो ही जाता होगा ?
दादूजी- 
घट मांहीं मया घणी, बाहर त्यागी होय ।
फाटी कंथा पहर कर, चिह्न करे सब कोय ॥ ७५ ॥
(माया अंग १२)
अकबर- कपट का परिणाम क्या होता है ? 
दादूजी-
सांचे मत साहिब मिलैं, कपट मिलेगा काल ।
सांच परमपद पाइये, कपट काया में साल ॥ ७५ ॥
(काल अंग २५)
अकबर-दंभियों का अनुकरण करने से क्या होता है ? 
दादूजी बोले-
देखा देखी सब चलें, पार न पहुँचा जाय ।
दादू आसन पहल के, फिर-फिर बैठे आय ॥ १०९ ॥
(मन अंग १०)
अकबर- प्राणियों को कर्म का फल कैसे मिलता है । 
दादूजी – मन की वासना अनुसार- 
जप तप करणी कर गये, स्वर्ग पहुंचे जाय ।
दादू मन की वासना, नरक पड़े फिर आय ॥ १०५ ॥
(मन अंग १०)
फिर मन के विषयक अनेक विचार व्यक्त करके सत्संग समाप्त कर दिया ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें