बुधवार, 17 सितंबर 2014

१०. दुष्ट को अंग ~ १

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
.
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*१०. दुष्ट को अंग*
.
*मनहर छन्द –* 
*आपनै न दोष देखै पर के औगुन पेखै,* 
*दुष्ट कौ सुभाव उठि निंदा ई करतु है ।* 
*जैसैं कोऊ महल संवारि राख्यौ निकै करि,* 
*कीरी तहां जाइ छिद्र ढूंढ़त फिरतु है ॥* 
*भोर ही तैं सांझ लग सांझ ही तैं भोर लग,* 
*सुन्दर कहत दिन ऐसैं ही भरतु है ।* 
*पांव के तरे की आगि सूझै नहीं मूरिख कौं,* 
*और सौं कहत सिर ऊपर बरतु है ॥१॥* 
(सभी दुष्ट पुरुष ऐसे ही होते हैं कि) जो अपना दोष कभी नहीं देखते, अपितु दूसरों का दोष देखने में अपनी समस्त बुद्धि लगा देते हैं । यह दुष्ट जन की प्रकति ही बन जाती है कि वह प्रसंग उठते ही दूसरे की निन्दा करना आरम्भ कर देता है । 
जैसे कोई सज्जन अपना घर साफ़ स्वच्छ रखता हो, वहाँ कोई चींटी पहुँच जाय और वह वहाँ(उस घर में) छिद्र खोजने लगे । 
इसी प्रकार, यह दुष्ट पुरुष भी प्रातः से सांय काल तक या सायंकाल से प्रातः तक *श्री सुन्दरदास जी* के कथनानुसार, परनिन्दा में ही अपना समय बिताता है । 
उस मूर्ख को अपने पैरों के नीचे जलती हुई अग्नि नहीं दीखती, परन्तु दूसरों से कहता फिरता है कि उसके शिर पर अग्नि जल रही है ॥१॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें