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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“एकविंशति तरंग” ५/६)*
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*राजा २६ दिन में नरेना पहुँचे -*
है अमरावति दक्षिण देशहिं,
बेगि चले रथ अश्व जुताये ।
द्योस छबीस लगे मग भीतर,
दक्षिण तें अपने पुर आये ॥
है जगमाल खंगार तणो सुत,
ता सुत भूप नरायण भाये ।
भाखर सिंह जु कृष्ण रू भोज हिं,
रायमला दिक सोलह राये ॥५॥
दक्षिण देश के अमरावती - नगर से दोनों भाई तीव्रगति वाले अश्वों के रथ में बैठकर रवाना हुये । साथ में अन्य अश्वारोही सैनिक भी चल रहे थे । अमरावती से अपने देश तक पहुँचने की पंथयात्रा में उनके छब्बीस दिन व्यतीत हो गये । यह नारायण सिंह, प्रसिद्ध राजा खंगार सिंह के पौत्र और जगमालसिंह के पुत्र हुये थे । ये सोलह भाई थे - १.बड़े नारायण सिंह(नारायणपुर के नरेश), २.रायमल्लसिंह(गिधाणी ठाकुर), ३.दुर्जनशाल(गुढा), ४.मनोहरसिंह(मंढा), ५.हमीर सिंह(धांदोजी), ६.भारजरसिंह(साखूण), ७.बाधसिंह(कालक के ठाकुर), ८.किशन सिंह(कैरया ग्राम), ९.अमरसिंह(साली ग्राम के ठाकुर), १०.केशवसिंह(आकोदा के ठाकुर), ११.गैंदीसिंह(आदरवा), १२.तिलोकसिंह(ममाणा ग्राम), १३.उदय सिंह, १४.सांवल सिंह, १५.भींवराज, १६. भोजराज ॥५॥
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*राजा नारायण सिंग जी को श्रीदादूजी मिले -*
आय मिले तब भूप कुटुम्बहिं,
पूछत शैल कल्याण पुरी जू ।
संतहिं दर्शन हेतु चले नृप,
भक्त नरायणसिंह हरी जू ॥
पूछत खोजत संत मिले तहँ,
शीश निवाय प्रणाम करी जू ।
तेज तपोमय देखि अचम्भित,
हर्षित स्तुति यों उचरी जू ॥६॥
राजा नारायणसिंह अपने देश में आकर भाई - बंधु कुटुम्ब से मिले । सबकी कुशलक्षेम पूछी । पश्चात् कल्याणपुरी के बारे में पूछताछ की । तत्पश्चात् संत दर्शन की अभिलाषा सहित हरिभक्त राजा नारायणसिंह कल्याणपुरी की तरफ चल पड़े । पूछते - खोजते आखिर में संत श्री दादूजी मिल ही गये । राजा ने शीश नवाकर प्रणाम किया । संत का तपोमय तेज देखकर राजा अचम्भित हो गया, और हर्ष गद्गद होकर स्तुति करने लगा ॥६॥
(क्रमशः)

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