शनिवार, 20 सितंबर 2014

**सीकरी प्रसंग ३२ वां दिन**

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**सीकरी प्रसंग ३२ वां दिन**
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३२ वें दिन अकबर बादशाह ने कहा - भगवन् ! हिन्दुओं के सभी देवताओं के लोक बताये हैं , वैसे ही आप भी परमात्मा रूप ही है । अतः आपका भी कोई लोक विशेष होगा । इस लोक में तो आप जीवों के उद्धार बतावें आपका आदि स्थान कौन है ?
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यह सुनकर दादूजी ने कहा -
बारह मासी नीपजे, तहां किया सु प्रवेश ।
आवागमन भय को नहीं, सदा एक रस होय ॥१८॥
चल दादू तहँ जाइये, जहँ चंद सूर नहिं जाय ।
रात दिवस का गम नहीं, सहजैं रह्या समाय ॥१९॥
चल दादू तहँ जाइये, माया मोह से दूर ।
सुख दुख को व्यापे नहीं, अविनाशी घर पूर ॥२०॥
(मध्य अंग १६)
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फिर पद २६८ का –
२६८. परिचय उपदेश । त्रिताल
चल - चल रे मन तहाँ जाइये । चरण बिन चालिबो,
श्रवण बिन सुनिबो, बिन कर बैन बजाइये ॥टेक॥
तन नाहीं जहँ, मन नाहीं तहँ, प्राण नहीं तहँ आइये ।
शब्द नहीं जहँ, जीव नहीं तहँ, बिन रसना मुख गाइये ॥१॥
पवन पावक नहीं, धरणी अंबर नहीं, उभय नहीं तहँ लाइये ।
चन्द नहीं जहँ, सूर नहीं तहँ, परम ज्योति सुख पाइये ॥२॥
तेज पुंज सो सुख का सागर, झिलमिल नूर नहाइये ।
तहँ चल दादू अगम अगोचर, तामैं सहज समाइये ॥३॥
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द्वितीय पद २०० का –
२००. अत्यन्त निर्मल उपदेश । दादरा
चलु रे मन ! जहाँ अमृत वना, निर्मल नीके संत जना ॥टेक॥
निर्गुण नांव फल अगम अपार, संतन जीवन प्राण अधार ॥१॥
सीतल छाया सुखी शरीर, चरण सरोवर निर्मल नीर ॥२॥
सुफल सदा फल बारह मास, नाना वाणी धुनि प्रकाश ॥३॥
तहाँ वास बसि अमर अनेक, तहँ चलि दादू इहै विवेक ॥४॥
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तृ. पद २०१ का –
२०१. चौताल
चलो मन माहरा, जहाँ मित्र अम्हारा ।
तहँ जामण मरण नहिं जाणिये, नहिं जाणिये ॥टेक॥
मोह न माया, मेरा न तेरा, आवागमन नहीं जम फेरा ॥१॥
पिंड पड़ै नहीं प्राण न छूटै, काल न लागै आयु न खूटै ॥२॥
अमर लोक तहँ अखिल शरीरा, व्याधि विकार न व्यापै पीरा ॥३॥
राम राज कोई भिड़ै न भाजै, सुस्थिर रहणा बैठा छाजै ॥४॥
अलख निरंजन और न कोई, मित्र अम्हारा दादू सोई ॥५॥
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उक्त उपदेश सुनकर अकबर बादशाह ने कहा - स्वामिन् ! आज के उपदेश में मुझे कु़छ भी संशय नहीं रहा है, आपके सत्संग से प्राणी का कल्याण ही होता है । आपको बारंबार धन्यवाद है । आपके उपकार का बदला तो चुकाने में हम असमर्थ हैं । इतना कहकर अकबर ने प्रणाम किया । सत्संग समाप्ति का समय भी हो गया था । अतः अकबर आदि आज्ञा मांग कर चले गये ।

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